2050 तक हिमालय की नदियों में बदल जाएगी मछलियों की दुनिया, घट जाएंगी विशिष्ट प्रजातियां
डब्ल्यूआइआइ के अध्ययन के अनुसार, 2050 तक हिमालय की नदियों में मछलियों की औसत प्रजातीय समृद्धि बढ़ेगी, लेकिन कई विशिष्ट प्रजातियां घट जाएंगी और उनका स्थान बदलेगा।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
सुमन सेमवाल, देहरादून। जलवायु परिवर्तन का हिमालय की नदियों में रहने वाली मछलियों पर खासा असर पड़ेगा। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) के विज्ञानियों के अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2050 तक मछलियों की औसत प्रजातीय समृद्धि बढ़ती दिखाई देती है, लेकिन कई मौजूदा प्रजातियों का स्थान बदलेगा और विशिष्ट पारिस्थितिक गुणों वाली मछलियों की संख्या कम हो जाएगी।
116 मछली प्रजातियों पर अध्ययन
यह बात सामने वार्षिक शोध संगोष्ठी में 'बदलते हिमालय के प्रति जैव विविधता की प्रतिक्रिया: मीठे पानी की मछलियों की दीर्घकालिक निगरानी और संरक्षण प्राथमिकता' है। शीर्षक के अध्ययन में बयां की गई।
अध्ययन में पश्चिमी, मध्य और पूर्वी हिमालय की 116 मछली प्रजातियों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। आंकड़े राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के मिशन के तहत वर्ष 2015-2020 और 2021-2026 की मैदानी निगरानी, प्रकाशित विज्ञानी साहित्य और वैश्विक जैव विविधता डेटाबेस से लिए गए।
विज्ञानियों ने मछलियों के भविष्य का अनुमान लगाने के लिए विशिष्ट विज्ञानी माडल का इस्तेमाल किया। इसमें दो जलवायु परिदृश्य लिए गए। जिससे वर्ष 2050 के लिए संभावित स्थिति का आकलन किया गया।
तलहटी की नदियों में अभी 80 से अधिक प्रजातियां
वर्तमान स्थिति में सबसे अधिक मछली विविधता हिमालय की तलहटी वाली नदियों में मिली, जहां कुछ क्षेत्रों में 80 से अधिक प्रजातियां मौजूद हैं। लेकिन यही क्षेत्र भविष्य में नुकसान के लिहाज से भी संवेदनशील पाए गए। यानी जहां अभी सबसे ज्यादा प्रजातियां हैं, वहां जलवायु परिवर्तन के कारण उल्लेखनीय बदलाव का खतरा भी है।
अध्ययन में मछली समुदायों का सबसे बड़ा बदलाव मध्य और पश्चिमी हिमालय में पाया गया। खासकर 500 से 1,500 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मछलियों में बदलाव का स्तर सबसे अधिक था। कुछ नदियों में 40 प्रतिशत से अधिक मछली समुदाय के स्थानांतरण का अनुमान लगाया गया है। इसके विपरीत पूर्वी हिमालय के मछली समुदाय तुलनात्मक रूप से अधिक स्थिर रहने का अनुमान है।
यह भी पढ़ें- हिमालय पर टिकी देश की 20% अर्थव्यवस्था खतरे में, ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार 65% बढ़ी, 56 झीलें अति संवेदनशील
संरक्षित क्षेत्र भी पूरी सुरक्षा नहीं
अध्ययन में जलवायु के लिहाज से अपेक्षाकृत स्थिर रहने वाले क्षेत्रों यानी जलवायु अनुकूल क्षेत्रों की भी पहचान की गई। इनमें से कई क्षेत्र मौजूदा जैव विविधता वाले प्रमुख क्षेत्रों से अलग पाए गए।
कुछ संभावित शरणस्थल संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हैं या बांध प्रभावित नदी गलियारों से जुड़े हैं। इस कारण विज्ञानियों ने केवल संरक्षित क्षेत्रों पर निर्भर रहने के बजाय पूरे नदी बेसिन को जोड़कर संरक्षण करने की जरूरत बताई है। तलहटी और मध्यम ऊंचाई वाली नदियों को भविष्य के संरक्षण की महत्वपूर्ण प्राथमिकता बताया गया है।
