देवताओं के काल से है कांवड़ जल से जलाभिषेक की परंपरा, सोमवार के साथ ही मंगलवार का दिन भी खास
श्रावण मास में कांवड़ के जल से भगवान शिव का जलाभिषेक अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य देता है, जिसकी परंपरा देवताओं के काल से चली आ रही है। ...और पढ़ें


समय कम है?
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जागरण संवाददाता, रुड़की। श्रवण मास में कांवड़ के जल से भगवान शिव का जलाभिषेक करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। कांवड़ जल से भोलेनाथ के जलाभिषेक करने की परंपरा देवताओं के काल से ही मानी जाती है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की परिसर स्थित श्री सरस्वती मंदिर के आचार्य राकेश कुमार शुक्ल के अनुसार पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान जिस समय भगवान शिव ने संसार के कल्याण के लिए हलाहल विष का पान किया था, उस समय विष की ज्वाला से उनका कंठ नीला पड़ गया था।
रावण पहला शिवभक्त कांवड़ यात्री
विष की ज्वाला को शांत करने के लिए देवताओं ने कांवड़ के द्वारा जल भरकर भगवान शिव के ऊपर डाला था। तभी से कांवड़ की परंपरा का प्रारंभ हुआ था। जबकि त्रेता युग में रावण को पहला शिवभक्त कांवड़ यात्री माना गया है। रावण के अलावा भगवान परशुराम तथा श्रवण कुमार के द्वारा भी इस परंपरा का प्रारंभ माना जाता है।
भगवान शिव पर कांवड़ का जल चढ़ाने से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पदार्थों की प्राप्ति होती है। उन्होंने बताया कि श्रावण मास में सोमवार के दिन का विशेष महत्व होता है। क्योंकि सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है। इसके अलावा सोमवार चंद्रमा का भी दिन होता है और भगवान शंकर चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। इसलिए ऐसी मान्यता है कि सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा करने से अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है।
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मंगलवार का दिन भी विशेष
सोमवार के अलावा सावन के महीने में मंगलवार के दिन की भी बड़ी विशेषता है। क्योंकि सावन मास में मंगलवार के दिन मंगला गौरी का व्रत किया जाता है। यह व्रत आदिशक्ति माता पार्वती को समर्पित होता है। इस व्रत को करने से स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याओं को सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है। श्रावण मास में भगवान शिव अपनी ससुराल दक्ष प्रजापति की नगरी हरिद्वार में विराजमान होते हैं। इसलिए हरकी पैड़ी के गंगाजल का विशेष महत्व माना जाता है।