Mallikarjun Shuddhikaran Controversy: उत्तराखंड के हल्द्वानी में हुआ था 'शुद्धिकरण', छिड़का था गंगाजल
Mallikarjun Haldwani Rally Shuddhikaran: मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में उत्तराखंड के हल्द्वानी रैली के बाद हुए 'शुद्धिकरण' हवन पर दुख व्यक्त किया, जिसे उन्होंने अपनी दलित पहचान से जोड़ा।
HighLights
हल्द्वानी में कांग्रेस की विजय शंखनाद रैली का आयोजन
रैली के बाद रामलीला मैदान का 'शुद्धिकरण' हवन
खरगे ने राज्यसभा में दलित पहचान से जोड़ा यह मुद्दा
ऑनलाइन डेस्क, उत्तराखंड। Haldwani Ramlila Ground purification news: मल्लिकार्जुन खरगे ने गुरुवार को राज्यसभा में हल्द्वानी रैली के बाद हुए 'शुद्धिकरण' हवन पर दुख व्यक्त किया, इस वाकये को उन्होंने अपनी दलित पहचान से जोड़ा।
दरअसल पिछले शनिवार आठ अगस्त को उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस की विजय शंखनाद रैली का आयोजन किया गया था।रामलीला मैदान में आयोजित उक्त रैली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य सहित कई नेता शामिल थे। रैली के दिन भी हल्द्वानी में काफी विवाद की स्थिति रही।
एसएसपी ऑफिस में हुआ था हंगामा
रैली में आ रहे कार्यकर्ताओं के वाहनों को जगह-जगह चेकिंग के नाम पर पुलिस की ओर से रोकने पर प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता एसएसपी दफ्तर पहुंचकर धरने पर बैठ गए थे। इस दौरान कांग्रेस नेताओं द्वारा एसएसपी के लिए अपशब्द कहे जाने का वीडियो भी खूब वायरल हो गया।
वहीं भाजपा ने भी आरोप लगाया कि खरगे की रैली के दौरान मुस्लिम धर्म के समर्थन में नारे लगाए थे।
हवन करने के साथ छिड़का गंगाजल
रैली के दो दिन बाद 10 अगस्त को श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास नाम के संगठन ने रामलीला मैदान पहुंच हवन करने के साथ गंगाजल भी छिड़क डाला। संगठन का कहना था कि रामलीला मैदान सनातन से जुड़े कार्यक्रमों का स्थल है। इसकी पवित्रता को खंडित किया गया है।
जिसके बाद कांग्रेस ने आरोप लगाया कि रैली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य शामिल थे जो दलित वर्ग से आते हैं। इसलिए रामलीला मैदान में शुद्धिकरण हवन कार्यक्रम आयोजित किया गया।
मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में उठाई बात
अब यही बात गुरुवार को मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में उठाई। मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, "...मैं हल्द्वानी में था, जहां मैंने रामलीला मैदान में एक जनसभा को संबोधित किया। वहां लाखों लोग मौजूद थे। उस समय, मैंने किसी समुदाय या धर्म का नाम नहीं लिया, मैंने केवल सरकार से जुड़े मुद्दों को दोहराया।
लेकिन मेरे भाषण के बाद, बीजेपी के लोगों ने उस मंच को 'शुद्ध' करने के लिए वहां हवन किया... क्या लोकतंत्र में ऐसा होता है? आप संविधान की रक्षा कैसे कर रहे हैं? मैं विपक्ष का नेता हूं।" "मैं इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहता। मैं बरसों से इस सदन का सदस्य रहा हूं। मैं अनुसूचित जाति से आता हूं और दलित हूं, मैंने कभी किसी से यह गुहार नहीं लगाई कि 'मेरी मदद करो' या 'मेरी रक्षा करो'।
जिस पर केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने घटना को दुखद कहा और जांच का आश्वासन दिया।
यशपाल आर्य ने भी उठाए सवाल
वहीं उत्तराखंड के नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने भी रामलीला मैदान हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद कथित रूप से शुद्धिकरण हवन कराए जाने की घटना ने लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
उन्होंने कहा है कि 'उत्तराखंड की धरती सामाजिक समरसता, भाईचारे और लोकतांत्रिक चेतना की भूमि रही है। हल्द्वानी जैसे शहर में इस प्रकार की घटना का सामने आना प्रदेश की सामाजिक एकता के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण है। भाजपा नेताओं को यह समझना चाहिए कि समाज को जोड़ने का समय है, जाति और ऊंच-नीच की दीवारें खड़ी करने का नहीं।
मल्लिकार्जुन खड़गे केवल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि देश के वरिष्ठतम जननेताओं में से एक हैं। उनका सार्वजनिक जीवन संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष को समर्पित रहा है। ऐसे नेता की जनसभा के बाद मैदान का शुद्धिकरण करना सामाजिक बराबरी की उस भावना का अपमान है, जिसकी स्थापना के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित अनेक महापुरुषों ने जीवनभर संघर्ष किया।
किसी भी सार्वजनिक स्थान की पवित्रता किसी व्यक्ति की जाति, वर्ग या राजनीतिक विचारधारा से निर्धारित नहीं होती। लोकतंत्र में सार्वजनिक मैदान जनता के होते हैं और वहां अलग-अलग राजनीतिक दलों की सभाएं होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है। किसी राजनीतिक कार्यक्रम के बाद उस स्थान को ‘शुद्ध’ करने की कोशिश समाज में छुआछूत और ऊंच-नीच जैसी पुरानी कुरीतियों को बढ़ावा देने वाली मानसिकता को प्रदर्शित करती है।
भारतीय संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता, सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार दिया है। संविधान की मूल भावना सामाजिक भेदभाव को समाप्त कर सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देने की है। ऐसे में सार्वजनिक रूप से किए गए इस प्रकार के प्रतीकात्मक कृत्य समाज में गलत संदेश देते हैं और सामाजिक सद्भाव को कमजोर करते हैं।
मेरा भाजपा से सवाल है यदि किसी सार्वजनिक मैदान में किसी दलित नेता की सभा होने के बाद उसे शुद्ध करने की आवश्यकता महसूस की जाती है, तो क्या भाजपा नेतृत्व इस मानसिकता का समर्थन करता है? यदि नहीं, तो भाजपा को इस घटना पर अपना स्पष्ट पक्ष जनता के सामने रखना चाहिए।
विचारधारा का मुकाबला विचारधारा से होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर उसके प्रति अपमानजनक व्यवहार करके। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की जाति नहीं, बल्कि उसके विचार, कर्म और संवैधानिक अधिकार महत्वपूर्ण हैं।'
राम के नाम पर खड़े हो गए टटपूजिए दुकानदार: हरीश रावत
पूर्व सीएम हरीश रावत ने कहा कि 'कितनी घटिया मानसिकता है। 21वीं सदी में जब इंसान अंतरिक्ष में दूसरी दुनिया बसाने की कल्पना कर रहा है। कुछ लोग आज भी जातिवादी और तथाकथित "घृणित संकीर्ण मनोवृत्ति" से उबर नहीं पा रहे हैं। दुःख की बात यह है कि ऐसी मनोवृत्ति करने वाले लोगों का संबंध जब किसी राजनीतिक दल, वह भी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल से दिखाई देता है, तो अत्यधिक दुःख होता है।
रामलीला मैदान में रामलीला के मंच से यदि किसी दलित का संबोधन हो, तो क्या वहां शुद्धि हवन किया जाना चाहिए? और यदि किया है तो ऐसे लोगों के ऊपर भारतीय दंड संहिता की कठोरतम धारा के अंदर मुकदमा चलना चाहिए? सत्तारूढ़ दल को उनके साथ अपने संबंधों पर सफाई देनी चाहिए?
भगवान राम, जिन्होंने केवट को सखा और शबरी को मां कहा और उसके जूठे बेर खाए, इसीलिए राम राजा रामचंद्र के रूप में युग बदल गए, मगर राम पूजे जाते हैं। मगर राम के नाम पर ये जो टटपूजिए दुकानदार खड़े हो गए हैं, इनसे देश और समाज को छुटकारा मिलना चाहिए।'
