पिथौरागढ़ में बेटियों ने तोड़ी रूढ़ियां, पिता की अर्थी को दिया कंधा; रामगंगा घाट पर दी चिता को मुखाग्नि
बेरीनाग, पिथौरागढ़ में दो विवाहित बेटियों, हेमा कार्की और नीमा कार्की ने अपने पिता नंदन सिंह दसौनी का अंतिम संस्कार कर सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ा। ...और पढ़ें

पिथौरागढ़ के बेरीनाग में विवाहित बेटियों ने पिता की अर्थी को कंधा दिया और मुखाग्नि भी दी। जागरण

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संवाद सूत्र, बेरीनाग ( पिथौरागढ़)। तेजी से बदल रही दुनिया में रिश्तों की अहमियत भी कम होने लगी है। जहां विदेश में रहने वाले बेटे अपने माता-पिता की अंतिम समय में मदद तो दूर अंत्येष्टि करने के लिए भी नहीं पहुंच रहे हैं।
ऐसे में बेरीनाग से विवाहित बेटियों के साहसिक निर्णय की खबर समाज को आईना दिखाने वाली है। इन बेटियों ने बुजुर्गों के परंपरागत तर्कों को खारिज किया और पिता का अंतिम संस्कार किया।
पाताल भुवनेश्वर क्षेत्र के नैनी शीतला/मोना गांव निवासी 75 वर्षीय नंदन सिंह दसौनी का सोमवार की रात निधन हो गया था। उनका बेटा नहीं है और दो बेटियां हैं, जिनका विवाह हो चुका है।
पिता के निधन की सूचना मिलते ही दोनों बेटियां अपने ससुराल से आईं। इस बीच घर पर चिता को मुखाग्नि देने को लेकर चर्चा होने लगी।
गांव के बड़े बुजुर्गों ने मुखाग्नि दिए जाने को लेकर कहा कि चचेरे-तहेरे भाइयों में से कोई पुरुष सदस्य यह कार्य कर सकता है। गांवों में अभी तक इसी तरह क्रियाकर्म होते रहे हैं।
तभी मृतक की दोनों बेटियां हेमा कार्की व नीमा कार्की आगे आईं और उन्होंने चिता को स्वयं मुखाग्नि देने का निर्णय लिया।
अंतिम संस्कार की सभी रस्म पूरी करने के बाद दोनों बेटियां पिता की अर्थी को कंधा देते हुए थल स्थित रामगंगा घाट पहुंचीं। जहां ग्रामीणों की मौजूदगी में दोनों बेटियों ने चिता को मुखाग्नि दी।
भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष दीपक धानिक, रवि धानिक समेत समस्त कई लोगों ने बेटियों के इस कदम को समाज में बदलती सोच का प्रतीक बताते हुए उनकी सराहना की।
उन्होंने कहा कि ऐसे उदाहरण न केवल परंपरागत तरीकों को चुनौती देते हैं, बल्कि यह भी साबित करते हैं कि जिम्मेदारियों के निर्वहन में बेटा-बेटी का कोई भेद नहीं होना चाहिए।
पूर्व में भी सीमांत में कई उदाहरण आए प्रकाश में
इससे पहले भी पिथौरागढ़ में ऐसे कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। करीब डेढ़ माह पूर्व बांसबगड़ क्षेत्र में भी एक बेटी ने अपनी पिता का अंतिम संस्कार किया।
दिसंबर, 2025 में एक पूर्व सैनिक के निधन पर उनकी सात बेटियों ने न केवल पिता को कंधा दिया, बल्कि मुखाग्नि भी दी।
इनमें से सीआइएसएफ में कार्यरत एक बेटी ने तो धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए मुंडन भी कराया था।
जहां अब तक माता-पिता की चिता को मुखाग्नि देने के दायित्व को केवल पुत्रों से ही जोड़कर देखा जाता था, वहां भी अब बेटियां इस जिम्मेदारी को निभाकर समाज की सोच बदलने का काम कर रही हैं।
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