मां काली की भक्ति से जुड़ी बंगाल की राजनीति: स्वतंत्रता संग्राम से लेकर अब तक जारी है पुरानी परंपरा
बंगाल की सियासत में नेताओं की मां काली के प्रति आस्था की पुरानी परंपरा रही है, जो राजनीतिक विचारधाराओं से परे है।

नेताओं की मां काली के प्रति आस्था पुरानी परंपरा
HighLights
नेताओं की मां काली के प्रति आस्था पुरानी परंपरा
सोमेन मित्र, ममता बनर्जी की कालीपूजा बनी पहचान
कालीपूजा का स्वतंत्रता आंदोलन से भी गहरा संबंध
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल की सियासत में विचारधाराएं और राजनीतिक दल भले बदलते रहे हों, लेकिन मां काली के प्रति नेताओं की आस्था की परंपरा पुरानी है।
कांग्रेस के सोमेन मित्र और फाटाकेष्ट से लेकर तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी और भाजपा में शामिल हुए तापस राय तक, कई नेताओं की कालीपूजा उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बनी रही है। किसी की पूजा ने इलाके में खास पहचान बनाई तो किसी के आयोजन में सत्ता और सिनेमा जगत की हस्तियों का जमावड़ा लगा।
उच्च शिक्षा मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय के हाल ही में थानों में कालीपूजा कराने के सुझाव के बाद यह पुरानी परंपरा एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल मंत्री ने हाल ही में बीरभूम के सिउड़ी में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि जिस तरह पुलिस थानों में विजय सम्मिलनी आयोजित होती है, उसी तरह प्रत्येक थाने में मां काली की पूजा भी होनी चाहिए।
हालांकि बंगाल में नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की काली आराधना कोई नई बात नहीं है। अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोगों ने वर्षों तक इस परंपरा को आगे बढ़ाया है।
सोमेन मित्र की पूजा की रही अलग पहचान
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सोमेन मित्र की पहचान अमहर्स्ट स्ट्रीट की कालीपूजा से गहराई से जुड़ी रही। उनकी पूजा में राजनीतिक दलों के नेताओं से लेकर फिल्मी हस्तियों तक की मौजूदगी रहती थी। कांग्रेस के दिग्गज नेता बरकत गनी खान चौधरी जब उनसे नाराज होते थे तो उन्हें 'अमहर्स्ट स्ट्रीट का नेता, जो कालीपूजा करता है' कहकर संबोधित करते थे।
राजनीतिक मतभेदों के बावजूद बरकत और प्रणब मुखर्जी दोनों कई बार सोमेन मित्र की पूजा में शामिल हुए थे। इसी इलाके में कांग्रेस से जुड़े कृष्णचंद्र दत्त यानी फाटाकेष्ट की कालीपूजा भी काफी लोकप्रिय रही।
उन्होंने 1957 में इसकी शुरुआत की थी। उनके पूजा पंडाल में महानायक उत्तम कुमार और अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार पहुंचे थे। कहा जाता है कि अमिताभ ने मन्नत पूरी होने पर देवी को सोने की नथ चढ़ाई थी। फाटाकेष्ट की पूजा के साथ कई किस्से और लोककथाएं भी जुड़ी हुई हैं।
ममता और तापस राय की पूजा भी बनी चर्चा का विषय
तृणमूल कांग्रेस की पूर्व प्रमुख और बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के 30बी हरीश चटर्जी स्ट्रीट स्थित आवास की कालीपूजा भी लंबे समय से चर्चित रही है।
मुख्यमंत्री रहने के दौरान उनके घर की पूजा में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के अलावा आइएएस, आइपीएस अधिकारियों तथा फिल्मी हस्तियों की भी मौजूदगी रहती थी। पूजा के दिन उनके आवास पर लोगों की भीड़ जुटती थी।
दूसरी ओर, कांग्रेस से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले तापस राय की अमहर्स्ट स्ट्रीट की कालीपूजा भी अपनी अलग पहचान रखती है। वह तृणमूल कांग्रेस में रहे और बाद में भाजपा में शामिल हुए।
फिलहाल राज्य के उद्योग मंत्री तापस राय की पूजा की परंपरा राजनीतिक बदलावों के बावजूद जारी रही है। इससे पता चलता है कि बंगाल में कालीपूजा किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा तक सीमित नहीं रही।
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा है इतिहास
बंगाल में मां काली की आराधना का संबंध धार्मिक आस्था के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से भी रहा है। कोलकाता की पाथुरियाघाटा सार्वजनिक कालीपूजा इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस पूजा की आयोजन समिति के अध्यक्ष नेताजी सुभाषचंद्र बोस 1930-31 के दौरान रहे थे।
यह पूजा पाथुरियाघाटा व्यायाम समिति से जुड़ी है, जिसकी स्थापना में क्रांतिकारी जतिंद्रनाथ मुखर्जी यानी बाघा जतिन की भूमिका थी। यह संस्था स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े युवाओं के शारीरिक प्रशिक्षण और लाठी-कला का केंद्र भी रही थी। नेताजी की मां काली के प्रति व्यक्तिगत आस्था के भी दस्तावेजी प्रमाण मिलते हैं।
29 अक्टूबर, 1943 को सिंगापुर से अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस को भेजे गए बांग्ला पत्र पर उन्होंने अपने हाथ से 'श्रीश्री कालीपूजा' लिखा था। यह पत्र नेताजी रिसर्च ब्यूरो के अभिलेख में सुरक्षित है।
इसके अलावा, प्रेसिडेंसी जेल में बंद रहने के दौरान 1940 में उन्होंने कालीपूजा के पवित्र दिन अपने अनशन संबंधी पत्र में मां काली का उल्लेख किया था। इस तरह नेताजी का संबंध मां काली की आराधना से व्यक्तिगत आस्था और सार्वजनिक धार्मिक आयोजन, दोनों स्तरों पर प्रमाणित होता है।
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