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जब अपने ही दे गए दगा... TMC का अस्तित्व बचाने के लिए ममता के पास अब क्या विकल्प?

By Indrajit SinghEdited By: Swaraj Srivastava
Published: Thu, 04 Jun 2026 12:12 PM (IST)

तृणमूल कांग्रेस में बड़ा संकट सामने आया है, जहाँ 58 बागी विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन ...और पढ़ें

ऋतब्रत ने संकेत दिया कि ममता बनर्जी का सम्मान बना रहेगा और उनकी सलाह ली जा सकती है

ऋतब्रत ने संकेत दिया कि ममता बनर्जी का सम्मान बना रहेगा और उनकी सलाह ली जा सकती है

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इंद्रजीत सिंह, कोलकाता। बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा संकट सामने आ गया है। पार्टी के 58 बागी विधायकों ने विधानसभा में तृणमूल के परिषदीय दल पर नियंत्रण स्थापित करते हुए निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया।

विधानसभा अध्यक्ष रथीन्द्र बोस ने भी उन्हें मान्यता दे दी है। इसके साथ ही 28 वर्ष के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब ममता बनर्जी की इच्छा के विरुद्ध पार्टी के भीतर कोई बड़ा फैसला लागू हुआ।

विधानसभा में मान्यता मिलने के बाद ऋतब्रत ने संकेत दिया कि ममता बनर्जी का सम्मान बना रहेगा और उनकी सलाह ली जा सकती है, लेकिन पार्टी के संचालन और राजनीतिक फैसलों की कमान बागी खेमे के हाथ में ही रहेगी। इससे साफ हो गया है कि तृणमूल के भीतर शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल चुका है।

इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद ममता बनर्जी ने कालीघाट स्थित आवास पर अपने करीबी नेताओं के साथ बैठक की। बैठक में अभिषेक बंद्योपाध्याय, फिरहाद हकीम, कुणाल घोष और शोभनदेव चट्टोपाध्याय सहित कई नेता मौजूद थे। बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा हुई।

ममता के सामने फिलहाल पहला विकल्प कानूनी लड़ाई का

ममता बनर्जी के सामने फिलहाल पहला विकल्प कानूनी लड़ाई का है। वह विधानसभा अध्यक्ष द्वारा ऋतब्रत को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दिए जाने के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती हैं।

ममता खेमे का दावा है कि विपक्ष के नेता के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय का नाम प्रस्तावित किया गया था। हालांकि संसदीय मामलों में अदालतें आमतौर पर सीधे हस्तक्षेप नहीं करतीं, लेकिन अतीत में कई मामलों में अध्यक्ष के फैसलों की न्यायिक समीक्षा हुई है।

दूसरा विकल्प बागी विधायकों को पार्टी से निष्कासित करने का

दूसरा विकल्प बागी विधायकों को पार्टी से निष्कासित करने का है। यदि ऐसा होता है तो तृणमूल के विधायकों की संख्या घटकर लगभग 20 रह जाएगी और पार्टी प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा भी खो सकती है। इसके बाद बागी विधायक चुनाव आयोग के पास जाकर स्वयं को असली तृणमूल बताकर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग पूरे मामले की जांच करेगा। केवल विधायकों की संख्या ही नहीं, बल्कि सांसदों, संगठन के विभिन्न पदाधिकारियों और पार्टी संरचना में समर्थन का भी आकलन किया जाएगा। आयोग सभी पक्षों की राय लेकर तय करेगा कि वास्तविक तृणमूल किसे माना जाए।

इसलिए चुनाव चिह्न बचाने की संभावना अभी भी ममता खेमे के पास बनी रह सकती है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि विधायकों की यह बगावत सांसदों और संगठन के अन्य स्तरों तक भी पहुंची है या नहीं।

तीसरा रास्ता बागी विधायकों से बातचीत का

ममता बनर्जी के सामने तीसरा रास्ता बागी विधायकों से बातचीत का है। लेकिन यह विकल्प फिलहाल सबसे कठिन माना जा रहा है। बागी खेमे ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

ऐसे में समझौते की कोई भी कोशिश अभिषेक की भूमिका को लेकर विवाद पैदा कर सकती है, जिसकी संभावना फिलहाल बेहद कम दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल इस समय अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है।

अब यह देखना होगा कि ममता बनर्जी कानूनी लड़ाई का रास्ता चुनती हैं, बागियों के खिलाफ कड़ा कदम उठाती हैं या फिर किसी तरह संगठन को एकजुट रखने का प्रयास करती हैं। आने वाले दिनों में तृणमूल का भविष्य और उसके चुनाव चिह्न की स्थिति काफी हद तक इन्हीं फैसलों पर निर्भर करेगी।

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