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बंगाल के चामटा वेटलैंड में देशी कैटफिश का सफल संरक्षण, मछुआरों को मिला लाभ

Published: Fri, 26 Jun 2026 08:05 PM (IST)

आइसीएआर-सिफरी और वर्ल्डफिश ने चामटा वेटलैंड में वैज्ञानिक मत्स्य संवर्धन से देशी कैटफिश प्रजातियों का सफल संरक्षण किया। इस पहल से वेटलैंड पुनर्जीवित हुए।

चामटा वेटलैंड में देशी कैटफिश प्रजातियों का सफल संरक्षण।

चामटा वेटलैंड में देशी कैटफिश प्रजातियों का सफल संरक्षण।

HighLights

  1. चामटा वेटलैंड में देशी कैटफिश प्रजातियों का सफल संरक्षण।

  2. वैज्ञानिक पेन कल्चर से 387 किलोग्राम कैटफिश का उत्पादन।

  3. मछुआरों की आय में वृद्धि और वेटलैंड का पुनरुद्धार।

जागरण संवाददाता, कोलकाता। अंतर्देशीय मत्स्य संरक्षण और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए आइसीएआर– सिफरी (सेंट्रल इनलैंड फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट), बैरकपुर ने चामटा वेटलैंड में उच्च मूल्य वाली देशी कैटफिश प्रजातियों के संरक्षण और पुनर्स्थापन में सफलता प्राप्त की है।

यह कार्य वैज्ञानिक मत्स्य संवर्धन कार्यक्रम के तहत वर्ल्डफिश के सहयोग से किया गया। चामटा वेटलैंड बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बनगांव क्षेत्र में स्थित एक प्राकृतिक आर्द्रभूमि है, जहां स्थानीय मछुआरा समुदाय परंपरागत रूप से मत्स्य पालन करता है। आइसीएआर– सिफरी तथा वर्ल्ड फिश के संयुक्त कार्यक्रम के तहत यहां वैज्ञानिक मत्स्य संरक्षण परियोजना चलाई जा रही है।

इस उपलब्धि को चामटा वेटलैंड में आयोजित फिश हार्वेस्ट मेला और वैज्ञानिक- मछुआरा संवाद कार्यक्रम के दौरान प्रदर्शित किया गया। छह महीने के वैज्ञानिक पेन कल्चर अभियान (वैज्ञानिक तरीके से जालबंद क्षेत्र में मछली पालन अभियान) के बाद कुल 387 किलोग्राम देशी कैटफिश (मिस्टस कैवेसियस) का उत्पादन हुआ।

चामटा वेटलैंड में देशी कैटफिश प्रजातियों का सफल संरक्षण (1)

मछली बीज 33.6 ग्राम तक पहुंच गया

औसतन 2.28 ग्राम वजन के छोड़े गए मछली बीज का वजन बढ़कर औसतन 33.6 ग्राम तक पहुंच गया, जो बेहतर वृद्धि और जीवित रहने की दर को दर्शाता है। इस अवसर पर संस्थान के निदेशक डा. प्रदीप दे ने कहा कि वैज्ञानिक तरीकों से देशी मछलियों का संरक्षण आज विकास की रणनीतिक आवश्यकता बन चुका है।

उन्होंने कहा कि इस तरह की पहल न केवल खराब हो चुके आर्द्र क्षेत्रों (वेटलैंड) को पुनर्जीवित करती है, बल्कि जलीय जैव विविधता की रक्षा, मछुआरों की आय वृद्धि और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को भी मजबूत करती है। उन्होंने कहा कि यह पहल विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप है।

संस्थान के रिजर्वायर एवं वेटलैंड फिशरीज डिवीजन के प्रमुख डा. आरके मन्ना ने कहा कि देशभर में टिकाऊ मत्स्य प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए ज्ञान साझा करने और संस्थागत सहयोग को लगातार बढ़ाना जरूरी है।

चामटा फिशरमेन कोआपरेटिव सोसाइटी के प्रबंधक प्रोनय बाला ने बताया कि इस परियोजना से स्थानीय मछुआरों की आमदनी में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और वेटलैंड में मूल्यवान देशी मछली प्रजातियों की वापसी संभव हुई है।

यह पहल दो महत्वपूर्ण देशी कैटफिश प्रजातियों - मिस्टस कैवेसियस और मिस्टस टेंगरा के पारिस्थितिक संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इस माडल के तहत पहले मछली बीजों को सुरक्षित पेन एनक्लोजर में पाला गया और बाद में उन्हें खुले वेटलैंड में छोड़ा गया, जिससे उनके जीवित रहने की संभावना काफी बढ़ी।

संस्थान ने इस पूरी प्रक्रिया में तकनीकी सहायता प्रदान की, जिसमें एचडीपीई पोल और शिकारी-रोधी जाल से पेन निर्माण, पानी एवं मिट्टी की गुणवत्ता की निगरानी, मछलियों के स्वास्थ्य प्रबंधन और संतुलित तैरता आहार शामिल रहा। स्थानीय मछुआरों को वैज्ञानिक तरीके से भोजन देना, पेन की देखभाल और निगरानी का प्रशिक्षण भी दिया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार इस परियोजना से आर्थिक लाभ भी तेजी से बढ़े हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चामटा माडल अब पूरे देश में छोटी देशी मछली प्रजातियों के संरक्षण, जैव विविधता बचाने और मछुआरों की आय बढ़ाने के लिए एक आदर्श माडल बन सकता है।

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