नेपाल में 38 मिनट की देरी ने कर दिया त्रासदी को विकराल, सिस्टम बेहतर तरीके से काम करता तो बच सकती थीं जानें
नेपाल में आपदा से पहले लोगों को बचाने वाला "डिजास्टर अर्ली वार्निंग सिस्टम" यानी खतरे की घंटी 38 मिनट बाद बजी, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।

नेपाल में 38 मिनट की देरी ने कर दिया त्रासदी को विकराल
HighLights
सुबह 8:37 बजे दर्ज हुई हलचल, करीब सवा नौ बजे भेजा अलर्ट
महज 38 मिनट की देरी के कारण लग गया लाशों का ढेर
द कन्वर्सेशन, मैनचेस्टर। नेपाल में आपदा से पहले लोगों को बचाने वाला "डिजास्टर अर्ली वार्निंग सिस्टम" यानी खतरे की घंटी 38 मिनट बाद बजी, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
खतरे की घंटी बजने से पहले ही आपदा पहुंच गई और देखते देखते लाशों का ढेर लग गया। ऐसी तबाही मची जिसकी टीस कभी भूली नहीं जा सकेगी।
दरअसल 26 अगस्त को सुबह 8:37 बजे चीन के साथ लगी नेपाल की सीमा के पास उपकरणों ने कुछ हलचल को दर्ज किया, जिसे शुरू में भूकंप समझा गया था।
नेपाल के बाढ़ प्रबंधन अधिकारियों को इस घटना के बारे में सुबह करीब नौ बजे पता चला और उन्होंने सुबह करीब सवा नौ बजे इमरजेंसी एसएमएस अलर्ट भेजा, लेकिन तब तक नेपाल में तबाही अपना रौद्र रूप दिखा चुकी थी।
दिलचस्प सवाल यह है कि अगर चेतावनी देने वाला सिस्टम बेहतर तरीके से जुड़ा होता, तो क्या आपदा को रोका जा सकता था?
क्या भूकंप की रीडिंग, सेटेलाइट की तस्वीरों व दूसरी जानकारियों के बीच समन्वय संभव था कि यह पता चल सके कि क्या हो रहा है और बहाव की दिशा में आगे रहने वाले लोगों को चेतावनी दी जा सके?
आपदा से पहले सतर्क करने के सिस्टम को और बेहतर होने की जरूरत
मौजूदा अर्ली-वार्निंग सिस्टम अक्सर खास तरह के खतरों, जैसे कि बारिश से होने वाली आम बाढ़ या ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं, लेकिन नेपाल में हाल ही में आई यह आपदा न तो ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ थी और न ही कोई सामान्य बाढ़। इसके बजाय, लगता है कि भूस्खलन या हिमस्खलन के कारण यह आपदा आई।
