आलीशान मकान से भव्य मंदिर तक; कैसे खूनी नस्लीय इतिहास वाले जॉर्जिया के फोर्सिथ काउंटी को नया रूप दे रहे हैं भारतीय?
जॉर्जिया के फोर्सिथ काउंटी में भारतीय-अमेरिकी आबादी ने पिछले दो दशकों में जनसांख्यिकी और सांस्कृतिक माहौल को पूरी तरह बदल दिया है, जो अब कुल आबादी का 16 प्रतिशत हैं।

फोर्सिथ काउंटी में भारतीय-अमेरिकी आबादी का बढ़ता प्रभाव

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डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। अमेरिका के उत्तर जॉर्जिया स्थित फोर्सिथ काउंटी में पिछले दो दशकों में डेमोग्राफिक तौर पर एक बहुत बड़ा बदलाव आया है। यहां बढ़ती भारतीय-अमेरिकी आबादी ने इसके आस-पड़ोस बिजनेस और कल्चरल माहौल को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
बेहतर अवसरों और मजबूत कम्युनिटी नेटवर्क की तलाश में हजारों भारतीय परिवार इस इलाके में आकर बस गए हैं, लेकिन इस तेजी से बदलते सामाजिक ताने-बाने ने स्थानीय निवासियों के साथ मेलजोल और रिश्तों पर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भारतीयों की बढ़ती आबादी
समाचार एजेंसी पाटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, फोर्सिथ काउंटी में अब लगभग 52,000 भारतीय रहते हैं, जो कुल आबादी का करीब 16 प्रतिशत हिस्सा हैं। इस इलाके में गोरे लोगों के बाद भारतीय दूसरा सबसे बड़ा एथनिक ग्रुप बन गए हैं, जिनकी आबादी यहां 63.5 प्रतिशत है।
हालांकि, इस तेजी से बढ़ती आबादी का सभी ने खुले दिल से स्वागत नहीं किया है। कम्युनिटी लीडर्स का कहना है कि भारतीय प्रवासियों और स्थानीय गोरे नागरिकों के बीच मेल-जोल की कमी के कारण आपसी दूरियां और नाराजगी बढ़ी है।
इसके अलावा, अमेरिका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के एमएजीए मूवमेंट के उभार के साथ ही एंटी-इमिग्रेंट (प्रवासियों के खिलाफ) भावनाओं में भी इजाफा देखा गया है।
फोर्सिथ कैसे बना पसंदीदा ठिकाना?
जॉर्जिया में भारतीय प्रवासियों का इतिहास 1960 के दशक से शुरू होता है, जब छात्र और शिक्षाविद एमोरी यूनिवर्सिटी और जॉर्जिया टेक जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने या काम करने आए थे। 2000 की जनगणना के समय यहां मात्र 160 भारतीय परिवार थे, लेकिन 1990 के दशक के आखिर में माइग्रेशन में तेजी आई।
USA इंडिया बिजनेस समिट के प्रोग्राम चेयर अनी अग्निहोत्री ने पीटीआई को बताया कि भारतीय किराना स्टोर, मंदिर, अच्छे स्कूलों और पहले से बसे मजबूत नेटवर्क ने फोर्सिथ को जॉर्जिया आने वाले परिवारों के लिए बेहद आकर्षक डेस्टिनेशन बना दिया है। यहां के भारतीय परिवारों की औसत सालाना इनकम लगभग 1,50,000 डॉलर है, जो अमेरिकी औसत से काफी अधिक है।
अग्निहोत्री के अनुसार, भारतीय परिवार अमूमन बड़े घर, बड़ी कारें, अच्छी कमाई, धार्मिक आस्था और अपने बच्चों को आइवी लीग कॉलेजों में भेजने के सपने के साथ अमेरिका आते हैं। सुवानी जैसे इलाकों में इंडियन सुपरमार्केट, रेस्टोरेंट और सांस्कृतिक केंद्र इस बढ़ती आबादी की गवाही देते हैं।
नस्लीय हिंसा और खौफनाक इतिहास
यह डेमोग्राफिक बदलाव एक ऐसे काउंटी में हो रहा है जिसका नस्लीय हिंसा और विस्थापन का एक लंबा और खौफनाक इतिहास रहा है। गोरे लोगों के यहाँ आने से पहले यह चेरोकी मूल निवासियों का घर था, जिन्हें 19वीं सदी में धमकियों और कानूनी तरीकों से उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया था। यह इतिहास ट्रेल ऑफ टीयर्स के रूप में दर्ज है।
इसके अलावा, 1912 में एक श्वेत महिला के कथित उत्पीड़न के बाद यहां भड़की हिंसा में अश्वेतों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, जिसके चलते दशकों तक फोर्सिथ में लगभग केवल गोरे लोग ही रहे। यहां तक कि 1980 के दशक के अंत तक भी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट्स के शांति मार्च का यहाँ पुरजोर विरोध किया गया था।
इतिहासकार पैट्रिक फिलिप्स ने अपनी किताब 'ब्लड एट द रूट्स' में इस इलाके की इसी खूनी पृष्ठभूमि का गहराई से विश्लेषण किया है।
अतीत को जानना क्यों जरूरी है?
लंबे समय से जॉर्जिया में रह रहे वेणु चल्ला ने पीटीआई से बातचीत में कहा कि यहां बसने वाले अधिकांश भारतीयों को शायद इस जमीन के काले इतिहास के बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी। वे ऐसे आलीशान गेटेड कम्यूनिटीज में रह रहे हैं जहां करोड़ों की प्रॉपर्टीज भारतीयों ने खरीद रखी हैं।
चल्ला का मानना है कि भले ही आज खुले तौर पर नस्लवाद देखने को न मिलता हो, लेकिन नए प्रवासियों के लिए उस जगह के अतीत को जानना बेहद जरूरी है जहां वे अपना नया जीवन बसा रहे हैं। इससे उन्हें स्थानीय समाज के संदर्भ को समझने और खुद को बेहतर ढंग से ढालने में मदद मिलती है।
स्थानीय राजनीति में कदम
आर्थिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद, कम्युनिटी लीडर्स मानते हैं कि भारतीयों को स्थानीय समाज के साथ और अधिक घुलने-मिलने की जरूरत है। हालांकि, नई पीढ़ी इस मामले में पुरानी पीढ़ी के मुकाबले स्थानीय संस्कृति में अधिक सहजता से घुल-मिल रही है।
स्थानीय राजनीति में भी अब बदलाव दिखने लगा है। हाल ही में दूसरी पीढ़ी की भारतीय-अमेरिकी सुचिता पटेल ने डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर फोर्सिथ काउंटी कमिश्नर का चुनाव लड़ा था, जो इस बात का संकेत है कि अब यह समुदाय सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व में भी अपनी सक्रिय भूमिका दर्ज करा रहा है।
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