ट्रंप ने व्हाइट हाउस में क्यों कराई कट्टरपंथी मिलर की एंट्री, भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने स्टीफन मिलर को व्हाइट हाउस का नया चीफ ऑफ स्टाफ नियुक्त किया है, जो उनके घरेलू एजेंडे को और कड़ा करेगा।


समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपने सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाने वाले स्टीफन मिलर को व्हाइट हाउस का नया चीफ ऑफ स्टाफ नियुक्त किया है।
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी द्वारा कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप अपने घरेलू एजेंडे को नरम करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं।
ट्रंप ने अपने अमेरिका फर्स्ट अभियान के प्रमुख रणनीतिकार को व्हाइट हाउस के केंद्र में लाकर यह साफ कर दिया है कि वह डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली संसद के साथ आने वाले दो वर्षों के सीधे टकराव के लिए तैयार हैं। 2016 से ट्रंप के प्रमुख सलाहकार रहे मिलर 9 नवंबर को सूसी वाइल्स की जगह पद संभालेंगे।
कितना ताकतवर होता है चीफ ऑफ स्टाफ का पद?
व्हाइट हाउस का चीफ ऑफ स्टाफ अमेरिकी प्रशासन में सबसे प्रभावशाली गैर-निर्वाचित पद माना जाता है। हालांकि इस पद के पास कोई स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार नहीं होता, लेकिन राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कैसे करेंगे, इस पर इसका सीधा असर रहता है।
चीफ ऑफ स्टाफ राष्ट्रपति के लिए मुख्य गेटकीपर की तरह काम करता है। ओवल ऑफिस में कौन प्रवेश करेगा, किन वरिष्ठ अधिकारियों को क्या जिम्मेदारी मिलेगी और किन नीतियों पर राष्ट्रपति का ध्यान जाएगा, यह सब वही तय करता है।
वह राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, आंतरिक नीति टीमों और संवाद विभागों के बीच समन्वय बैठाने का काम भी करता है। पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ सूसी वाइल्स को प्रशासन में संगठनात्मक अनुशासन लाने का श्रेय दिया जाता था, जबकि मिलर हमेशा से वैचारिक और आक्रामक नीतियों के प्रेरक रहे हैं।
इमिग्रेशन पर कड़ा रुख तय
मिलर की नियुक्ति से यह तय माना जा रहा है कि इमिग्रेशन नीति पर प्रशासन का रुख और सख्त होगा। मिलर ने ट्रंप के पहले कार्यकाल में परिवारों को अलग करने वाली विवादित नीति बनाई थी और दूसरे कार्यकाल के बड़े पैमाने पर निर्वासन यानी मास डिपोर्टेशन कार्यक्रम को भी तैयार किया है।
वह अवैध प्रवासियों को देश से बाहर निकालने के लिए राष्ट्रपति के विशेषाधिकारों के अत्यधिक उपयोग के पक्षधर रहे हैं। संसद पर डेमोक्रेट्स के नियंत्रण के बाद जब नए कानून बनाना मुश्किल होगा, तब आशंका है कि एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स के जरिए सख्त नियम लागू करेगा।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
यूं तो मिलर ने भारत को लेकर कोई अलग नीतिगत बयान नहीं दिया है, लेकिन अमेरिकी कामगारों के हितों को प्राथमिकता देने की उनकी सोच का सीधा असर भारतीयों पर पड़ सकता है।
अमेरिका में कुशल विदेशी कामगारों में सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय नागरिकों का है। वित्तीय वर्ष 2025 में स्वीकृत H-1B वीजा आवेदनों में लगभग 70% भारतीय थे।
ट्रंप प्रशासन पहले ही अमेरिका से बाहर रहने वाले कर्मचारियों के नए H-1B आवेदनों के लिए 100000 डॉलर की फीस और उच्च वेतन वाले पदों को प्राथमिकता देने जैसे नियम ला चुका है। मिलर के आने से विदेशी प्रोफेशनल्स को नौकरी पर रखने वाली कंपनियों की जांच और सख्त हो सकती है।
इससे भारतीय आईटी कंपनियों, अमेरिकी टेक फर्मों और नौकरी की तलाश कर रहे हजारों भारतीयों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दूसरी तरफ, इन पाबंदियों के कारण अमेरिकी कंपनियां अपने उच्च-मूल्य वाले काम को अमेरिका लाने के बजाय भारत स्थित अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स में स्थानांतरित भी कर सकती हैं।
कैसे हो सकते है अगले दो साल?
मिलर की भूमिका केवल इमिग्रेशन तक सीमित नहीं रहेगी। वह सरकारी कर्मचारियों की संख्या घटाने, डाइवर्सिटी कार्यक्रमों को रोकने और संघीय एजेंसियों की जांच शक्तियां बढ़ाने के पक्षधर रहे हैं।
संसद में डेमोक्रेट्स की ओर से मिलने वाली कड़ी चुनौतियों और जांच के बीच, ट्रंप प्रशासन नीतियों को लागू करने के लिए राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेशों का अधिक सहारा ले सकता है।
हालांकि, इस रास्ते को भी अमेरिकी अदालतों और न्यायपालिका की कड़ी समीक्षा तथा कानूनी मुकदमों का सामना करना पड़ेगा।
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