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कौशल से कौतूहल तक चीन की पाठशाला: किताबों के साथ हुनर की पढ़ाई, बचपन से मिलेगा स्किल मंत्र

Published: Thu, 24 Sep 2026 10:50 PM (IST)

शंघाई में चल रही वर्ल्ड स्किल्स प्रतियोगिता के दौरान भारतीय दल ने चीन के प्राथमिक स्तर से शुरू होने वाले मजबूत व्यावसायिक शिक्षा मॉडल का अध्ययन किया।

व्यावसायिक शिक्षा मॉडल का अध्ययन (यह तस्वीर AI द्वारा जनरेट की गई है।)

व्यावसायिक शिक्षा मॉडल का अध्ययन (यह तस्वीर AI द्वारा जनरेट की गई है।)

HighLights

  1. शंघाई में वर्ल्ड स्किल्स प्रतियोगिता में भारत ने 63 विधाओं में भाग लिया।

  2. भारतीय दल ने चीन के प्राथमिक स्तर के वोकेशनल स्कूलों का दौरा किया।

  3. भारत को मजबूत कौशल इकोसिस्टम और मानसिकता बदलने की आवश्यकता है।

जितेंद्र शर्मा, शंघाई। प्रत्येक दो वर्ष के अंतराल पर होने वाले वर्ल्ड स्किल्स प्रतियोगिता में चीन चार बार से पदक तालिका में शीर्ष पर है। निस्संदेह उसका तकनीकी कौशल यहां कौतूहल बना हुआ है, लेकिन प्रश्न है कि कैसे? क्या भारत या अन्य देशों में प्रतिभा की कमी है? नहीं, इसका उत्तर भी पाठशाला के रूप में चीन ही दे रहा है।

इस देश में कौशल की गंभीरता, स्वीकार्यता और अनिवार्यता को इससे समझ सकते हैं कि यहां प्राथमिक स्तर से ही अकादमिक शिक्षा के समानांतर वोकेशनल स्कूल चल रहे हैं। हालांकि 2014 से कौशल को लेकर गंभीर हुआ भारत भी इस बार की प्रतियोगिता में 64 में से 63 कलाओं में अपना प्रभाव दिखाने आया है।

शंघाई में वर्ल्ड स्किल्स कॉम्पटिशन 2026 शुरू हो चुका है। 40 से अधिक देशों के प्रतिभागी अपने कौशल का प्रदर्शन कर रहे हैं। भारत ने भी कुल 64 में से पहली बार 63 कौशल विधाओं में 70 प्रतिभागियों के दल के साथ बढ़ते कदमों के निशान छोड़े हैं। प्रतियोगिता के परिणाम 27 सितंबर को घोषित होंगे।

दरअसल, यह परिणाम प्रतिभागियों के कौशल के होंगे, लेकिन चीन के स्किल ईकोसिस्टम संदेश ले सकते हैं कि 2014 में पहली बार अलग से कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय बनने वाली वर्तमान केंद्र सरकार को ईकोसिस्टम में और सुधार का कौशल दिखाना होगा।

प्रतियोगिता के शुरू होने से पहले चीन ने दुनिया को बताया कि वह किस तरह कौशल विकास पर काम कर रहा है। भारतीय दल के अधिकारी भी यहां के सिस्टम को देखने के लिए जुहुई डिस्ट्रिक्ट स्थित शंघाई इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी स्कूल पहुंचे।

देखा कि प्राथमिक स्तर के इस स्कूल में किसी अलग अलग विधाओं की प्रयोगशालाएं थीं, ट्रेनर थे। चूंकि यहां छोटे बच्चे थे, इसलिए शुरुआत घड़ी की असेंबलिंग और खिलौने बनाने जैसे कौशल से कराई गई है।

दल में शामिल रहे एक अधिकारी ने बताया कि चीन में प्राथमिक स्तर से वोकेशनल एजुकेशन के स्कूल समानांतर चल रहे हैं। यहां छात्रों के लिए यह जरूरी नहीं कि अकादमिक शिक्षा अलग से लेना जरूरी है, क्योंकि वोकेशनल एजुकेशन स्कूल में भाषा ज्ञान से लेकर अन्य आवश्यक अकादमिक जानकारी भी दी जाती है।

भारत में है क्षमता, चाहिए मजबूत स्किल ईकोसिस्टम

यहां आयोजन स्थल पर भारतीय पवेलियन में भारतीय मान्यताओं में शामिल जीवन जीने की 64 कलाओं का प्रदर्शन है और कल्पवृक्ष भी बनाया गया है। इसका संदेश है कि कौशल भारत की जड़ों में है, जिसका विस्तार हो रहा है।

खुद भी चीन का वोकेशनल एजुकेशन स्कूल देखकर आए प्रशिक्षण महानिदेशालय के महानिदेशक दिलीप कुमार ने माना कि सबसे पहले यह मानसिकता छोड़नी होगी कि कौशल की जरूरत सिर्फ उन युवाओं के लिए है, जो अकादमिक शिक्षा में बेहतर नहीं कर सकते।

कौशल को सम्मान देते हुए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की बहुत जरूरत है। यहां स्किल स्कूल में उद्योगों की आवश्यकता के अनुरूप हाईटेक लैब हैं। ऐसा भारत में भी करना होगा। महानिदेशक मानते हैं कि भारत में कौशल की राजधानी बनने की क्षमता है और पीएम सेतु योजना से जिस तरह औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों का कायाकल्प किया जा रहा है, उसके परिणाम अवश्य सामने आएंगे।