बाढ़ के बाद नेपाल के सामने नया संकट, 22 लाख टन मलबा बना मुसीबत; UNDP की रिपोर्ट में खुलासा
नेपाल में भोटेकोशी-त्रिशूली नदी में आई भीषण बाढ़ से 22 लाख टन मलबा जमा हो गया है, जिससे 1,110 से अधिक लोगों की मौत हुई और 4 हजार लापता हैं।

नेपाल में बाढ़ के बाद 22 लाख टन मलबा बना नई मुसीबत (फोटो-रॉयटर्स)

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डिजिटल डेस्क, काठमांडू। नेपाल में भोटेकोशी-त्रिशूली नदी में आई भीषण बाढ़ और मलबे के बहाब ने उत्तर-मध्य नेपाल में भयंकर तबाही मचाई है।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के शुरुआती आकलन के अनुसार, प्रभावित इलाकों में लगभग 22 लाख टन मलबा जमा हो गया है। इस भीषण त्रासदी में 1,110 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 4 हजार से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं।
मलबे तले दबी जिंदगियां
UNDP की रैपिड असेसमेंट एंड एनालिसिस फॉर इमीडिएट रिकवरी एंड डेवलपमेंट एक्शन (RAPIDA) रिपोर्ट के मुताबिक, जमा हुए मलबे में गिरी हुई इमारतों का सामान, घर की चीजें, चट्टानें, पेड़-पौधे और गाद शामिल हैं।
अनुमानित कुल मलबे में से करीब 5.56 लाख टन मलबा इमारतों का है, जो सैटेलाइट डेटा के आधार पर क्षतिग्रस्त हुई 2,359 इमारतों से निकला है।
UNDP का कहना है कि यह मलबा केवल तबाही का आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि इसके नीचे कई लोग दबे हुए हैं, जिससे राहत व बचाव कार्य बेहद कठिन और जोखिम भरा बन गया है।
84 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित
सरकारी आंकड़ों के हवाले से UNDP ने बताया कि छह जिलों की 17 नगर पालिकाओं के करीब 84,270 लोग इस प्राकृतिक आपदा से सीधे प्रभावित हुए हैं। इनमें से तीन-चौथाई लोग पहले से ही बुनियादी सुविधाओं और आजीविका की भारी चुनौतियों से जूझ रहे थे।
इस भीषण जलप्रलय से नेपाल के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को भी गहरा झटका लगा है। कुल 431.1 मेगावाट क्षमता वाले 11 हाइड्रोपावर स्टेशन और एक सोलर प्लांट पूरी तरह बंद हो गए हैं।
इसके अतिरिक्त, 470 मेगावाट क्षमता वाली 15 अन्य निर्माणाधीन हाइड्रोपावर परियोजनाएं भी क्षतिग्रस्त हुई हैं।
कृषि और खाद्य सुरक्षा पर मंडराया संकट
नेपाल में UNDP की रेजिडेंट रिप्रेजेंटेटिव क्योको योकोसुका ने इसे त्रिशूली कॉरिडोर के समुदायों के लिए एक बड़ी मानवीय त्रासदी करार दिया है।
उन्होंने कहा कि लोगों ने अपनों के साथ-साथ अपने घर और रोजगार भी खो दिए हैं। प्रभावित नगर पालिकाओं में 67.4% आबादी खेती पर निर्भर है।
UNDP के अनुसार, फसलों, मवेशियों और जमीन के नुकसान से इलाके में लंबे समय तक खाद्य सुरक्षा और आजीविका का गंभीर संकट भी पैदा हो सकता है।
