यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 17, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
उत्तराखंड: आपदा ने परिवार छीना तो व्यवस्था ने भविष्य
30 जून 2016 की रात्रि को बादल फटने की घटना में तबाह हुए कमलेश और उसके छोटे भाई व बहन को सरकार ने पुनर्वास और इंटर तक शिक्षा का वादा किया था। लेकिन अभी तक वादा पूरा नहीं हुआ।

पिथौरागढ़, [ओपी अवस्थी]: उफ! ऐसी संवेदनहीनता। जिसे देखकर कलेजा मुंह को आ जाता है, लेकिन आपदा के समय घड़ियाली आंसू बहाने वाले सत्ता और विपक्ष के नेताओं की संवेदना फिर भी नहीं जागती। वरना बादल फटने की घटना में अपने मां-बाप समेत पूरा परिवार गंवा देने वाले किशोरों को पत्थर तोड़ कर गुजर बसर नहीं करना पड़ता।
यह हाल है 30 जून 2016 की रात्रि को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद में बादल फटने की घटना में तबाह हुए कमलेश और उसके छोटे भाई ललित व बहन निर्मला का। नौलड़ा के कुमालगोनी गांव निवासी इन बच्चों को आपदा के बाद सरकार ने पुनर्वास और इंटर तक निशुल्क शिक्षा का वादा किया था।
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सरकारी वादे का भ्रम तब टूटा जब सरकार की तरफ से तीनों बच्चों को पठन पाठन हेतु नंदप्रयाग स्थित पतंजलि के आवासीय विद्यालय में राजस्व और शिक्षा विभाग की टीम के साथ भेज दिया गया। एक तरफ तीनों बच्चों को समारोह पूर्वक गांव से विदाई दी गई लेकिन वहां पहुंचने पर बच्चों का नामांकन स्कूल में नहीं हो पाया।
तीनों बच्चे एक सप्ताह बाद बड़ी मुश्किल से नाचनी स्थित पंचायत घर में बनाए गए आपदा राहत शिविर वापस लौट आए। जब यहां पहुंचे तो सरकारी इंटर कालेज में पढऩे की इच्छा जताई लेकिन समय अधिक होने जाने के कारण कक्षा 10 में पढ़ने वाले कमलेश कुमार को प्रवेश देने से मना कर दिया गया।
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कक्षा नौ में पढऩे वाले उसके छोटे भाई ललित कुमार और कक्षा सात में पढऩे वाली निर्मला को किसी तरह प्रवेश दे दिया गया। इन बच्चों के सामने अब पेट पालने की समस्या भी है। अभी तक उनके पास प्रशासन व अन्य लोगों से मिली राहत सामग्री थी, वह अब खत्म हो गई है। लिहाजा बड़ा भाई कमलेश अब मजदूरी करके अपने भाई-बहनों के लिए रोटी का इंतजाम कर रहा है।
समय बीतने के साथ ही सरकार को भी अपने वादे याद नहीं रहे। इसके अलावा गांव के पांच परिवार भी पंचायत घर को आपदा राहत शिविर बना कर रख तो दिए गए परंतु उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। आपदा के बाद उन्हें सांत्वना देने विपक्ष के नेता भी आए। नेताओं का तांता लगा रहा। सीएम तक ने उन्हें अनाथ नहीं समझने की नसीहत दी, लेकिन ये सब घड़ियाली आंसू और कोरे आश्वासन ही साबित हुए।
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पीड़ितों को भूली सरकार
पंचायत घर में बने आपदा शिविर में रहने वाले आपदा प्रभावित बताते हैं कि सरकार उन्हें भूल चुकी है। वादे तो खूब किए परंतु आपदा के छह माह बाद भी उनके लिए कुछ नहीं किया गया है। शिविर में रह रहे दीवानी राम सुबह से लकड़ी चीरने की मजदूरी कर रहा है तो वृद्ध महिलाएं भी रोड़ी तोड़ कर मजदूरी कर रही हैं। 76 वर्षीय मोहिनी देवी, कलावती देवी, द्रौपदी देवी, हरु ली देवी सहित अन्य बताते हैं कि अब कोई सुध नहीं ले रहा है।

