बांका में आसमान में बादल, पर बरस नहीं रहे बदरा; रूठे मेघराज को मनाने के लिए 'महाअनुष्ठान', आर्द्रा नक्षत्र भी बीता
बांका में आषाढ़ माह में भी बारिश न होने से चिंतित किसानों ने इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए आषाढ़ी पूजा का आयोजन किया। इस अनुष्ठान में गांवों में बकर ...और पढ़ें

आसमान में बादलों का डेरा, लेकिन बूंदाबांदी से आगे नहीं बढ़ रही बारिश
HighLights
बांका में आषाढ़ी पूजा का आयोजन, इंद्रदेव को प्रसन्न करने हेतु।
बारिश न होने पर किसानों ने बकरे-भेड़ की बलि दी।
आर्द्रा नक्षत्र बीतने के बाद भी तेज वर्षा का इंतजार।
जागरण संवाददाता, बांका। आषाढ़ का महीना तेजी से बीत रहा है और खेती के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाने वाला आर्द्रा नक्षत्र भी निकल चुका है, लेकिन बांका जिले के किसानों को अब तक मानसून की पहली तेज बारिश का इंतजार है। स्थिति यह है कि पिछले तीन-चार दिनों से आसमान में बादलों का डेरा तो है और सूर्यदेव के दर्शन भी नहीं हो रहे, लेकिन मौसम बूंदाबांदी से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इस सूखे जैसे हालात और रूठे इंद्रदेव को मनाने के लिए मंगलवार से जिले के विभिन्न हिस्सों में पारंपरिक 'आषाढ़ी पूजा' की शुरुआत हो गई।
परंपरागत विधि-विधान से देवी स्थानों की सफाई, कलश यात्रा
वर्षा देवता और ग्राम देवता को प्रसन्न करने के लिए बांका, फुल्लीडुमर, बेलहर, कटोरिया और बौंसी के दर्जनों गांवों में सुबह से ही भक्ति का माहौल देखा गया। ग्रामीण अंचलों में सुबह-सुबह महिलाएं पवित्र नदियों से पीतल के लोटे में जल भरकर कलश यात्रा के रूप में स्थानीय कालीथान, शीतलाथान और अन्य देवी स्थानों पर पहुंचीं। वहां उन्होंने पूरे विधि-विधान से मंदिर परिसर को धोकर साफ-सुथरा किया और देर शाम तक सुख-समृद्धि व अच्छी बारिश के लिए विशेष पूजा-अर्चना की।
सदियों पुरानी परंपरा: खेती से पहले ग्राम देवता की शरण
फुल्लीडुमर के गुरमी बथान गांव के काली मंदिर में जुटे ग्रामीणों ने बताया कि वे हर साल खेती-किसानी की शुरुआत करने से पहले आषाढ़ी पूजा का आयोजन करते हैं, ताकि इंद्रदेव प्रसन्न रहें और समय पर फसल की बुआई-रोपनी पूरी हो सके। मंदिर के पुजारी शंकर बाबा ने लोक आस्था पर भरोसा जताते हुए कहा कि ग्राम देवता और इंद्रदेव की इस विशेष पूजा के बाद वर्षा जरूर होगी। किसान सदियों से इस विधान को पूरा करते आ रहे हैं।
बादलों की लुकाछिपी देख बढ़ी किसानों की चिंता
बांका दुधारी के पास जुटे किसान जनक यादव, संदीप कुमार और जगदीश मंडल ने अपनी चिंता साझा करते हुए कहा, "पुरानी परंपरा के अनुसार आषाढ़ आते ही एक-दो तेज बारिश हो जाती थी। इस बार जेठ की तपिश झेलने के बाद आषाढ़ में भी पानी नहीं बरस रहा है। आसमान में सिर्फ बादलों की लुकाछिपी चल रही है। अब भगवान की शरण ही एकमात्र सहारा है और हमें पूरा भरोसा है कि जल्द ही अच्छी बारिश से धरती तृप्त होगी।"