अब दीवारों को बना सकेंगे मखमली और सुंदर, बांका के युवाओं ने बनाई इको-फ्रेंडली 'सिल्क टाइल्स'
बांका के तीन युवाओं ने हाथों से बनी इको-फ्रेंडली सिल्क टाइल्स विकसित की है, जिसे मैग्नेट तकनीक से दीवारों पर आसानी से लगाया जा सकता है। यह नवाचार स्था ...और पढ़ें

HighLights
बांका के युवाओं ने बनाई इको-फ्रेंडली सिल्क टाइल्स।
मैग्नेट तकनीक से दीवारों पर आसानी से लगती है यह टाइल्स।
स्थानीय रेशम उद्योग को बढ़ावा, रोजगार के अवसर सृजित।
बिजेन्द्र कुमार राजबंधु, बांका। रेशम उत्पादन के लिए देशभर में पहचान रखने वाला बांका जिला अब नवाचार के क्षेत्र में भी नई छाप छोड़ने की तैयारी में है। जिले में पहली बार हाथों से बनी इको-फ्रेंडली सिल्क टाइल्स तैयार की गई है।
अमरपुर प्रखंड अंतर्गत कटोरिया गांव के तीन युवाओं में सुशांत कुमार, चिन्मय किशोर और एजाज आलम उर्फ टार्जन ने मिलकर इस अनोखी तकनीक को विकसित किया है।
स्थानीय रेशम को आधुनिक डिजाइन और तकनीक के साथ जोड़कर तैयार किए गए इस उत्पाद को दिल्ली के इस्कान मंदिर में प्रदर्शित किया गया, जहां इसकी खूब सराहना हुई।
सिल्क टाइल्स की विशेषता यह है कि इसे दीवारों पर लगाने के लिए सीमेंट, बालू या अन्य निर्माण सामग्री की आवश्यकता नहीं पड़ती। मीडियम डेंसिटी फाइबर बोर्ड (एमडीएफ) पर मैग्नेट तकनीक का उपयोग कर सिल्क और अन्य फैब्रिक की परत चढ़ाकर इसे तैयार किया जाता है।
इससे टाइल्स को आसानी से दीवारों पर लगाया और हटाया जा सकता है। इधर, सहकारिता बैंक अध्यक्ष जितेंद्र सिंह के प्रयास से इस नवाचार को नाबार्ड से जोड़ा गया है।
देश में इस तरह की सिल्क टाइल्स का यह पहला प्रयोग : चिन्मय
चिन्मय किशोर ने बताया कि कुछ नया और उपयोगी करने के सोच ने इस नवाचार को जन्म दिया। उनका दावा है कि देश में इस तरह की सिल्क टाइल्स का यह पहला प्रयोग है।
वर्तमान में इसकी कीमत लगभग 1600 रुपये प्रति वर्ग फीट रखी गई है। उन्होंने बताया कि उत्पाद के लिए इंटेलेक्चुअल प्रापर्टी राइट्स (आइपीआर) के लिए आवेदन भी किया गया है। अधिकार मिलने के बाद व्यावसायिक उत्पादन और बिक्री शुरू की जाएगी।
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सिल्क व अन्य सजावट से तैयार होता है विशेष डिजाइन : सुशांत
सुशांत कुमार ने बताया कि यह उत्पाद पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल है। बांका में रेशम की प्रचुर उपलब्धता को देखते हुए इसकी शुरुआत यहीं से की गई है। सिल्क और अन्य सजावटी सामग्री का उपयोग कर विशेष पेंटिंग और डिजाइन तैयार होता है, जिससे प्रत्येक टाइल को अलग पहचान मिलती है।
उनका माना है कि स्थानीय संसाधनों पर आधारित यह नवाचार न केवल रेशम उद्योग को नई दिशा देगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा।
ऐसे मिले तीनों युवक और नवाचार को दिया स्वरूप
अमरपुर के कटोरिया निवासी सुशांत कुमार और चिन्मय किशोर, दोनों एक साथ ही पढ़े हैं। दोनों ने मिलकर इको-फ्रेंडली सिल्क टाइल्स बनाने की रणनीति तैयार की।
इसके बाद उन्हें साथ मिला गांव के ही एजाज आलम उर्फ टार्जन का। टार्जन का परिवार पहले से ही सिल्क का काम करता था। इस तरह तीनों युवाओं ने मिलकर मैग्नेट तकनीक से इको-फ्रेंडली सिल्क टाइल्स को विकसित किया।
सिल्क टाइल्स के उत्पादन और बिक्री को बढ़ावा देने के लिए युवाओं को प्रशिक्षण देने का निर्देश दिया गया है। इच्छुक युवाओं को प्रशिक्षित कर इस उद्योग से जोड़ा जाएगा, ताकि बड़े पैमाने पर उत्पादन हो सके और बांका जिले की नई पहचान देशभर में स्थापित हो। - गौतम कुमार सिंह, महाप्रबंधक, नाबार्ड।