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    बिहार की पहली रामसर साइट की दुर्दशा पर NGT सख्त, सरकार समेत 9 संस्थाओं को नोटिस जारी

    Updated: Wed, 15 Jul 2026 05:37 PM (GMT+05:30)

    राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने बिहार की पहली रामसर साइट कावर झील की बिगड़ती स्थिति पर स्वतः संज्ञान लिया है। झील के सिकुड़ने, अतिक्रमण, जल संकट और जैव ...और पढ़ें

    कावर झील। फोटो जागरण

    कावर झील। फोटो जागरण

    HighLights

    1. एनजीटी ने कावर झील की बिगड़ती स्थिति पर स्वतः संज्ञान लिया।

    2. बिहार सरकार समेत नौ संस्थाओं को नोटिस, मांगा जवाब।

    3. अतिक्रमण, जल संकट, जैव विविधता पर खतरे मुख्य चिंताएं।

    संवाद सहयोगी, छौड़ाही (बेगूसराय)। एशिया की सबसे बड़े मीठे पानी की गोखुर झील एवं रामसर साइट में शामिल कावर झील के संरक्षण को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने सख्त रुख अपनाया है।

    एनजीटी की प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने झील के लगातार सिकुड़ते स्वरूप, अतिक्रमण, जल संकट और जैव विविधता पर मंडरा रहे खतरे के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए बिहार सरकार समेत नौ संस्थाओं को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

    जल क्षेत्र की कमी से जूझ रही झील

    मंगलवार को न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता तथा विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कावर झील पर पिछले दो दशकों से बढ़ते अतिक्रमण, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक संघर्षों के कारण गंभीर पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होने की बात सामने आई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 में रामसर साइट का दर्जा प्राप्त कर चुकी यह झील आज जल क्षेत्र में लगातार कमी और पारिस्थितिक असंतुलन की समस्या से जूझ रही है।

    मत्यस्य उत्पादन में कमी

    पीठ ने माना कि कावर झील स्थानीय मछुआरा समुदाय की आजीविका का प्रमुख आधार रही है, लेकिन जल स्तर घटने, जल क्षेत्र के विखंडन और बढ़ते पर्यावरणीय दबाव के कारण मत्स्य उत्पादन में भारी गिरावट आई है।

    कई देसी मछली प्रजातियों के अस्तित्व पर भी संकट गहरा गया है। अधिकरण ने कहा कि मामला पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986, जैव विविधता अधिनियम-2002 तथा जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम से जुड़े गंभीर प्रश्न उठाता है।

    कोलकाता पीठ ट्रांसफर किया केस

    एनजीटी ने बिहार सरकार के मुख्य सचिव, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख, बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, बिहार राज्य जैव विविधता बोर्ड, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक तथा बिहार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को पक्षकार बनाते हुए शपथ पत्र के माध्यम से जवाब दाखिल करने का निर्देश दे आगे की सुनवाई के लिए कोलकाता पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया है।

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    पक्षी विहार हो चुका है घोषित

    बताते चलें कि जिले के 15,780 एकड़ क्षेत्र में फैली कावर झील गंगा के उत्तरी मैदानी क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण आर्द्र भूमि में शामिल है। इसका सर्वाधिक हिस्सा छौड़ाही अंचल में पड़ता है, जबकि चेरिया बरियारपुर, खोदावंदपुर, गढ़पुरा, नावकोठी और बखरी क्षेत्र भी इससे जुड़े हैं। 20 जनवरी 1989 को इसे पक्षी विहार घोषित किया गया था।

    पर्यावरण कार्यकर्ता राजेश कुमार सुमन बताते हैं कि कभी कमल दह, महालय-कोचालय, धनफर, गुआबाड़ी, एकंबा, श्रीपुर महाल और हरसाइन जैसे विशाल जलकुंड वर्षा के पानी से भर जाया करता था।

    चंद्रभागा सहित अन्य नदियों और चौर-बहियारों से आने वाले प्राकृतिक जलमार्ग अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं। नतीजतन झील के अधिकांश हिस्से से पानी गायब हो गया है। वर्तमान समय में एक हजार एकड़ क्षेत्र में भी स्थायी जल नहीं बचा है।

    क्यों अनमोल है कावर झील

    झील में रोहू, कतला, मांगुर, सिंगही, गरई, पोठिया, कवैई, पटेहिया, पलवा, बसराही, चेंगा, ढोंगा और चनदा जैसी स्थानीय मछली प्रजातियां यहां की पहचान है। हजारों मछुआरा परिवारों की आजीविका इन्हीं पर निर्भर है। झील में कमल, कुमुदिनी और जलकुंभी के अलावा तटीय क्षेत्रों में नीम, शीशम, बांस, बबूल, खजूर, सिरिस आदि 140 वनस्पति की प्रजातियां पाई जाती हैं।

    यहां 170 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनमें 60 प्रवासी हैं। सर्दियों में साइबेरिया और मध्य एशिया से एशियन ओपनबिल, बार हेडेड गूज और रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड जैसे हजारों पक्षी यहां पहुंचते हैं।

    झील में विश्व स्तर पर संकटग्रस्त बेयर्स पोचार्ड, सोसिएबल लैपविंग, रेड हेडेड वल्चर, व्हाइट रम्प्ड वल्चर और इंडियन वल्चर जैसी दुर्लभ प्रजातियां भी दर्ज की गई हैं, जो इसके वैश्विक पारिस्थितिक महत्व को प्रमाणित करती हैं।

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