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    अजगैवीनाथ धाम में 4 राज्यों के बांस से बन रहे कांवर, बंगाल के कांवरियों को भा रहा तारकेश्वरी रूप, वजह हैं भोलेबाबा

    Updated: Thu, 09 Jul 2026 03:59 PM (GMT+05:30)

    अजगैवीनाथ धाम में श्रावणी मेले की तैयारियां जोरों पर हैं, जहां कांवरियों का आगमन शुरू हो गया है। कांवर की भारी मांग के बावजूद बांस की कमी और बढ़ती कीम ...और पढ़ें

    सुल्तानगंज में 1 लाख शिवभक्तों के लिए 7 किस्म के बांसों से बन रहे कांवर

    सुल्तानगंज में 1 लाख शिवभक्तों के लिए 7 किस्म के बांसों से बन रहे कांवर

    HighLights

    1. श्रावणी मेले के लिए कांवरियों का आगमन शुरू।

    2. कांवर की भारी मांग, बांस की कमी।

    3. सिलीगुड़ी के मकोर बांस की विशेष मांग।

    संवाद सूत्र, अजगैवीनाथ धाम (भागलपुर)। विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला शुरू होने में अब महज 21 दिन शेष रह गए हैं, लेकिन सुल्तानगंज में करीब एक सप्ताह पहले से ही कांवरियों के जत्थों के आने का सिलसिला शुरू हो चुका है। इस वर्ष दो महीने लंबा श्रावणी मेला आयोजित होने के कारण देवघर जाने वाले शिवभक्तों की अपार भीड़ जुटने की पूरी संभावना है, जिसे देखते हुए प्रशासन के साथ-साथ स्थानीय दुकानदार भी तैयारियों में जुटे हैं। जहाँ एक तरफ कच्चा कांवरिया पथ में श्रद्धालुओं के ठहरने व भोजन के लिए अस्थाई होटलों का निर्माण जोर-शोर से चल रहा है, वहीं घाट रोड में कई दुकानदारों ने अभी से अपनी दुकानें सजाकर बिक्री भी शुरू कर दी है।

    हर दिन पहुंचेंगे 70 हजार से 1 लाख श्रद्धालु

    विदित हो कि विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला के दौरान प्रत्येक दिन 70 हजार से लेकर एक लाख तक श्रद्धालु अजगैवीनाथ धाम पहुंचते हैं और पवित्र उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान कर जल का संकल्प लेते हैं। इसके बाद शिवभक्त गंगाजल को कांवर में बांधकर बाबा बैद्यनाथ को जलाभिषेक करने के लिए 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा पर प्रस्थान करते हैं, यही कारण है कि यहाँ कांवर की मांग सबसे ज्यादा होती है। इस वर्ष मेले में आने वाले कांवरियों के लिए बिहार, बंगाल, झारखंड और पड़ोसी देश नेपाल के विशेष बांसों से कांवर बनाने में स्थानीय कारीगरों के साथ-साथ बिहार के कई अन्य जिलों के कारीगर भी जुटे हुए हैं।

    सिलीगुड़ी के मकोर बांस की भारी डिमांड

    इस बार कांवरिया नेपाल के अलावा बिहार, झारखंड और बंगाल के सिलीगुड़ी के बांस से बने कांवरों में गंगाजल उठाएंगे। सिलीगुड़ी के 'मकोर बांस' का बना हुआ कांवर काफी लचीला और आरामदायक होता है। काँवर लचीला हो तो शिवभक्तों को पैदल चलने में काफी आसानी होती है, इसलिए कांवर निर्माण करा रहे बांस व्यापारी बंगाल के सिलीगुड़ी से पर्याप्त संख्या में मकोर बांस मंगवाकर दिन-रात काम करवा रहे हैं। इस बीच सावन शुरू होने से पहले ही स्थानीय और बाहरी दुकानदारों की तरफ से करीब एक लाख से अधिक काँवरों की आपूर्ति का एडवांस ऑर्डर मिल चुका है, जिसके कारण कारीगर युद्ध स्तर पर डटे हुए हैं।

    बांस की कमी से कारोबार बुरी तरह प्रभावित

    हालांकि, हर वर्ष की भांति इस वर्ष बांस की कीमतों में खासी बढ़ोतरी हुई है, जिसके कारण कांवर बनाने के लिए बांस की आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पा रही है और कारोबारी बेहद चिंतित हैं। व्यवसायियों का कहना है कि इस वर्ष 'हरौती बांस' पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलने के कारण झारखंड तथा सिलीगुड़ी के सुदूर इलाकों से मकोर बांस की महंगी खरीदारी करनी पड़ रही है, जिससे लागत काफी बढ़ गई है। दूरी अधिक होने के कारण मालभाड़ा बढ़ा है, जिससे कांवरों की खुदरा व थोक कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। अगर समय रहते बांस नहीं मिले तो मेले में कांवर का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

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    प्रतिदिन 20 हजार बांसों की है जरूरत

    व्यापारियों के अनुसार, मेला के दौरान अगर 15 से 20 हजार बांस की आपूर्ति प्रतिदिन होगी, तभी बाजार में पर्याप्त मात्रा में कांवर उपलब्ध हो पाएंगे, अन्यथा दुकानों पर कांवरों की भारी किल्लत हो जाएगी। फिलहाल अजगैवीनाथ धाम में सात अलग-अलग किस्म के बांसों से कांवर तराशे जा रहे हैं, जहाँ झारखंड, ओडिशा और यूपी के कांवरिया कड़े पहाड़ी बांस से बने कांवर को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। वहीं बंगाल के कांवरियों के बीच 'तारकेश्वरी कांवर' की पहली पसंद बनी हुई है, तो उत्तर बिहार व नेपाल से आने वाले कांवरियों के लिए स्थानीय हरौती बांस से बनी कांवरें मुख्य आकर्षण का केंद्र हैं।