सूर्यदेव का मेष संक्रांति प्रवेश : सतुआनी, जुड़शीतल, जानकी नवमी, बुद्ध पूर्णिमा और अक्षय तृतीया पर शुभ कार्यों का शुभारंभ
खरमास समाप्त होने के बाद 14 अप्रैल से सनातन परंपरा में शुभता का आरंभ हो रहा है। मेष संक्रांति के साथ सतुआनी, जुड़शीतल, अक्षय तृतीया, जानकी नवमी और बुद ...और पढ़ें

मेष संक्रांति से अक्षय तृतीया तक, जानिए कब कौन सा शुभ पर्व मनाया जाएगा
HighLights
14 अप्रैल से खरमास समाप्त, शुभता का नवप्रभात।
मेष संक्रांति, सतुआनी, अक्षय तृतीया जैसे पर्व मनाए जाएंगे।
दान, जप, तप व मांगलिक कार्यों के लिए विशेष फलदायी।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। खरमास की समाप्ति के साथ ही 14 अप्रैल से सनातन परंपरा में शुभता का नवप्रभात आरंभ होगा। सूर्यदेव के मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करते ही मेष संक्रांति का पुण्यकाल शुरू होगा, जिसके साथ सतुआनी का पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। इसके अगले दिन 15 अप्रैल को मिथिला की लोक-आस्था से जुड़ा जुड़शीतल पर्व मनाया जाएगा। वहीं 16 अप्रैल से विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होगा।
ज्योतिषाचार्य पंडित सचिन दूबे के अनुसार, इस वर्ष मेष संक्रांति के दिन शतभिषा नक्षत्र, शुक्ल योग, सिद्ध योग एवं त्रिपुष्कर योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। यह काल दान, जप, तप और धर्मकर्म के लिए अत्यंत फलदाई माना गया है। श्रद्धालु इस दिन सूर्यदेव की कृपा और पितरों की तृप्ति के लिए सत्तू, गुड़, चना, पंखा, मिट्टी के घड़े में जल एवं मौसमी फल अर्पित करेंगे।
सतुआनी में लोक आस्था का उत्सव
मेष संक्रांति के साथ ही सतुआनी पर्व का उल्लास ग्रामीण अंचलों में विशेष रूप से देखने को मिलेगा। यह पर्व सादगी, सेवा और दान की परंपरा का प्रतीक है। इस दिन अन्न और शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुओं का दान पुण्यदाई माना जाता है।
जुड़शीतल की परंपरा
15 अप्रैल को मनाया जाने वाला जुड़शीतल पर्व मिथिला की सांस्कृतिक पहचान है। इस दिन पूर्वभाद्र नक्षत्र व ब्रह्म योग का संयोग रहेगा। परंपरा के अनुसार, रात में जल को मिट्टी के घड़े या शंख में रखकर प्रातःकाल बड़े-बुजुर्ग घर के सदस्यों पर छींटा देते हैं। ऐसा करने से तन-मन में शीतलता और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
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अक्षय तृतीया पर शुभ क्रय और दान
20 अप्रैल को अक्षय तृतीया का पावन पर्व सर्वार्थ सिद्धि योग और रवियोग के विशेष संयोग में मनाया जाएगा। रोहिणी नक्षत्र के साथ यह तिथि दान-पुण्य और शुभ क्रय के लिए अत्यंत मंगलकारी मानी जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन किए गए सत्कर्म का फल अक्षय रहता है। सोना, चांदी, वाहन और भूमि क्रय की परंपरा इस दिन विशेष रूप से प्रचलित है।
वैशाख मास में व्रत-त्योहारों की श्रृंखला
वैशाख मास में आस्था की अविरल धारा प्रवाहित होगी। 13 अप्रैल को वरुथिनी एकादशी, 14 को सतुआनी, 15 को जुड़शीतल, 17 को वैशाख अमावस्या, 19 को परशुराम जयंती और 20 को अक्षय तृतीया मनाई जाएगी। इसके बाद 23 अप्रैल को गंगा सप्तमी, 25 अप्रैल को रवियोग व सिद्ध योग में जानकी नवमी, 27 को मोहिनी एकादशी और 30 अप्रैल को नृसिंह चतुर्दशी का पर्व पड़ेगा।
जानकी नवमी पर श्रद्धा का उत्सव
25 अप्रैल को माता सीता के प्राकट्योत्सव के रूप में जानकी नवमी मनाई जाएगी। सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखेंगी और मिथिला में विशेष पूजन-अर्चन होगा। यह दिन श्रद्धा और उल्लास से भरा रहेगा।
मास का समापन बुद्ध पूर्णिमा
वैशाख मास का समापन 1 मई को बुद्ध पूर्णिमा के साथ होगा। यह मास तप, दान, व्रत और साधना का प्रतीक बनकर श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक उन्नयन का संदेश देगा।