MLC उपचुनाव में वोट के लिए नोट का खेल, भोजपुर-बक्सर में प्रमाण पत्रों की खरीद-फरोख्त से हड़कंप
भोजपुर और बक्सर में एमएलसी उपचुनाव के दौरान जनप्रतिनिधियों के प्रमाण पत्रों की कथित खरीद-फरोख्त से राजनीतिक माहौल गरमा गया है। प्रत्येक वोट के लिए दस ...और पढ़ें

MLC उपचुनाव। ग्राफिक्स एआई जनरेटेड

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संवाद सूत्र, शाहपुर (आरा)। भोजपुर और बक्सर में हो रहे एमएलसी उपचुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी के बीच जनप्रतिनिधियों के प्रमाण पत्रों की कथित खरीद-फरोख्त की चर्चाओं ने चुनावी माहौल को गरमा दिया है।
क्षेत्र में चर्चा है कि चुनाव में नैतिकता और सिद्धांतों की बातें करने वाले कई जनप्रतिनिधियों के वोट अब पैसों के आधार पर प्रभावित किए जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार उपचुनाव में प्रत्याशियों के करीबी समर्थकों द्वारा वोट देने वाले जनप्रतिनिधियों से उनके प्रमाण पत्र जुटाए जा रहे हैं। इसके बदले तय राशि भी दी जा रही है। सूत्रों की मानें तो प्रत्येक वोट के लिए करीब दस हजार रुपये तक की पेशकश की जा रही है।
स्थिति तब और रोचक हो गई जब कुछ जनप्रतिनिधियों पर एक से अधिक प्रत्याशियों को प्रमाण पत्र देने का आरोप लगा। लालच में कुछ प्रतिनिधियों ने अलग-अलग पक्षों से संपर्क कर कई जगहों पर अपने प्रमाण पत्र सौंप दिए। जब प्रमाण पत्रों की जांच हुई तो फर्जीवाड़े का मामला उजागर हुआ।
भितरघात का खतरा
एक ही प्रतिनिधि द्वारा दो अलग-अलग लोगों को प्रमाण पत्र दिए जाने से कई स्तर पर सवाल उठ खड़े हुए। प्रत्याशियों के करीबी सूत्रों का कहना है कि चुनावी रणनीति के तहत पहले कुल वोटों के 50 प्रतिशत प्रमाण पत्र अपने पक्ष में सुरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में भितरघात की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरी प्रक्रिया में कई प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे, स्थानीय जनप्रतिनिधि और विभिन्न दलों के पदाधिकारी भी पर्दे के पीछे सक्रिय बताए जा रहे हैं। हालांकि, सभी जनप्रतिनिधियों पर सवाल नहीं उठ रहे। कई ऐसे प्रतिनिधि भी हैं, जिन्होंने बिना किसी लालच के अपनी निष्ठा के अनुसार सीधे प्रत्याशी को समर्थन पत्र सौंपा है।
खबरें और भी
गौरतलब है कि इस चुनाव में भोजपुर और बक्सर जिले के सांसद, विधायक, जिला परिषद सदस्य, मुखिया, बीडीसी, वार्ड सदस्य, नगर निकाय प्रतिनिधि समेत बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि मतदाता की भूमिका में हैं। ऐसे में चुनावी समीकरणों के बीच धनबल और नैतिकता को लेकर बहस तेज हो गई है।