Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    मुनीम की बही से डिजिटल आईटीआर तक: आरा में 166 साल में ऐसे बदली टैक्स की पूरी कहानी

    Updated: Fri, 24 Jul 2026 07:00 AM (IST)

    भारतीय आयकर व्यवस्था 166 साल की हो गई है, जिसकी शुरुआत 24 जुलाई 1860 को हुई थी। भोजपुर में मुनीम के बही-खातों से शुरू हुआ यह सफर अब डिजिटल आईटीआर तक प ...और पढ़ें

    जब मुनीम की कलम तय करती थी कारोबारी की आमदनी

    जब मुनीम की कलम तय करती थी कारोबारी की आमदनी

    HighLights

    1. 24 जुलाई को आयकर दिवस, भारतीय व्यवस्था 166 साल पुरानी।

    2. भोजपुर में 48,700 पैन कार्डधारक, 15,875 नियमित आईटीआर दाखिल करते हैं।

    3. मुनीम के बही-खातों से अब डिजिटल फेसलेस असेसमेंट तक का सफर।

    रितेश चौरसिया, आरा(भोजपुर)। 24 जुलाई को देशभर में आयकर दिवस मनाया जाएगा। भारत की आयकर व्यवस्था इस वर्ष 166 साल की हो रही है। 24 जुलाई 1860 को तत्कालीन ब्रिटिश वित्त सदस्य सर जेम्स विल्सन ने 1857 की क्रांति के बाद हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए पहली बार आयकर व्यवस्था लागू की थी।

    तब से अब तक टैक्स प्रणाली ने लंबा सफर तय किया है। भोजपुर में कभी मुनीमों के बही-खातों से आय का हिसाब होता था, आज मोबाइल और कंप्यूटर से आईटीआर दाखिल हो रहा है।

    भोजपुर में 48,700 पैन कार्डधारक

    आयकर विभाग के अनुसार भोजपुर में वर्तमान में 48,700 पैन कार्डधारक हैं, जिनमें 15,875 लोग नियमित रूप से आयकर रिटर्न दाखिल कर रहे हैं।

    नौकरीपेशा, व्यवसायी और स्वरोजगार से जुड़े लोगों की संख्या बढ़ने के साथ आईटीआर दाखिल करने वालों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है।

    पिछले वर्ष की तुलना में इस बार करीब पांच प्रतिशत अधिक लोगों ने रिटर्न दाखिल किया है। करीब 875 नए करदाता जुड़े हैं, जबकि कुल 6,955 अधिक रिटर्न दाखिल किए गए हैं।

    आरा से हर साल केंद्र को मिलता है करीब 200 करोड़ का आयकर

    भोजपुर जिले से हर साल करीब 200 करोड़ रुपये आयकर के रूप में केंद्र सरकार के खाते में जमा होते हैं।

    शिक्षक, बैंक कर्मचारी, पुलिसकर्मी, निजी क्षेत्र के कर्मचारी, छोटे कारोबारी और स्वरोजगार से जुड़े लोग अब कुछ ही मिनटों में ऑनलाइन आईटीआर दाखिल कर रहे हैं।

    डिजिटल व्यवस्था ने टैक्स प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑनलाइन सुविधाओं के कारण करदाताओं का भरोसा बढ़ा है और हर साल नए लोग टैक्स व्यवस्था से जुड़ रहे हैं।

    जब मुनीम की कलम तय करती थी कारोबारी की आमदनी

    अंग्रेजी शासन के दौर में आरा शाहाबाद क्षेत्र का प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। गोपाली चौक, शीशमहल चौक और चौक बाजार के अनाज, कपड़ा और सर्राफा कारोबारियों के यहां मुनीम कैथी, फारसी और महाजनी लिपि में बही-खाते तैयार करते थे।

    इन्हीं हस्तलिखित दस्तावेजों से व्यापारियों की आय का आकलन होता था। तब न पैन कार्ड था, न ऑनलाइन व्यवस्था। व्यापारी और जमींदार ट्रेजरी जाकर नकद कर जमा करते थे और आयकर विभाग का नोटिस मिलना बड़ी बात माना जाता था।

    टैक्स देने वाले रसूखदारों के हाथ में थी शहर की बागडोर

    ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1929 के आसपास आरा म्यूनिसिपल बोर्ड शहर के प्रशासन का प्रमुख केंद्र था। संपत्ति कर देने वाले प्रतिष्ठित नागरिकों, जमींदारों, व्यापारियों, बैंकरों, अधिवक्ताओं और चिकित्सकों को बोर्ड में प्रतिनिधित्व मिलता था।

    खबरें और भी

    उस दौर में टैक्स देने वाले प्रभावशाली नागरिक ही शहर के विकास की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते थे।

    इससे पता चलता है कि कर व्यवस्था सिर्फ राजस्व जुटाने का माध्यम नहीं थी, बल्कि स्थानीय प्रशासन और सामाजिक प्रभाव से भी जुड़ी हुई थी।

    कस्बों से गांवों तक पहुंचा टैक्स का दायरा, छोटे कारोबारी भी डिजिटल

    समय के साथ भोजपुर का व्यापारिक स्वरूप बदला तो टैक्स का दायरा भी बढ़ा। संदेश और गढ़हनी में राइस मिल तथा एग्रो प्रोसेसिंग इकाइयों के विस्तार से नए कारोबारी आयकर के दायरे में आए।

    पीरो, जगदीशपुर, बिहिया, शाहपुर, कोइलवर और बड़हरा के छोटे व्यापारी भी अब डिजिटल माध्यम से आईटीआर दाखिल कर रहे हैं।

    परिवहन, निर्माण और सेवा क्षेत्र से जुड़े कारोबारियों में एडवांस टैक्स और टीडीएस को लेकर जागरूकता भी पहले से बढ़ी है।

    कागजी फाइलों और दफ्तरों के चक्कर से फेसलेस असेसमेंट तक

    एक समय आयकर विभाग का नाम सुनते ही व्यापारियों में घबराहट होती थी। कागजी फाइलें, लंबी जांच प्रक्रिया और कार्यालयों के चक्कर आम बात थे।

    अब व्यवस्था तेजी से डिजिटल हो चुकी है। आरा के कतीरा, पकड़ी और हरि जी हाता क्षेत्र के चार्टर्ड अकाउंटेंट कार्यालयों में अधिकांश काम ऑनलाइन हो रहा है।

    फेसलेस असेसमेंट, ई-वेरिफिकेशन, ऑनलाइन रिफंड और ई-फाइलिंग ने टैक्स प्रक्रिया को आसान बनाया है।

    166 साल का यह सफर बताता है कि मुनीम की बही से शुरू हुई व्यवस्था अब डिजिटल भारत की आर्थिक भागीदारी का अहम हिस्सा बन चुकी है।