भोजपुर का बरगद पेड़ क्यों बना आकर्षण का केंद्र? ढाई सौ साल पुराने वटवृक्ष की अनोखी कहानी
भोजपुर के शाहपुर प्रखंड के सेमरिया ओझा पट्टी गांव में एक विशालकाय वटवृक्ष लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह लगभग 250 साल पुराना वृक्ष 25 हजार व ...और पढ़ें

संत दयापुरी बाबा के स्थान के पास खड़ा है इतिहास का साक्षी यह विशाल वटवृक्ष। जागरण
HighLights
सेमरिया ओझा पट्टी में विशाल वटवृक्ष आकर्षण का केंद्र।
लगभग 250 साल पुराना, 25 हजार वर्ग फीट में फैला।
ग्रामीणों की आस्था, विरासत और प्रकृति प्रेम का प्रतीक।
दिलीप कुमार ओझा, शाहपुर(आरा)। भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड के सेमरिया ओझा पट्टी गांव में स्थित एक विशालकाय वटवृक्ष इन दिनों लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
यह ऐतिहासिक वृक्ष ग्रामीणों की आस्था, विरासत और प्रकृति प्रेम की अनोखी मिसाल के रूप में सामने आया। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह वृक्ष खास माना जाता है।
क्योंकि इसकी शाखाओं से निकलने वाली जड़ें जमीन में पहुंचकर नए तनों का रूप लेती रहती हैं, जिससे इसका विस्तार लगातार बढ़ता जाता है।
करीब 22 से 25 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में फैला यह वटवृक्ष दूर से किसी प्राकृतिक उद्यान जैसा दिखाई देता है। इसकी सबसे अनोखी बात यह है कि इसकी मूल जड़ कहां है। इसका पता लगा पाना आसान नहीं है।
250 साल पुराने वटवृक्ष की छांव में बसती है गांव की पहचान
पेड़ की फैली शाखाओं से निकली दर्जनों जटाएं जमीन में समाकर नए तनों का रूप ले चुकी हैं। कई जड़ें अब भी हवा में झूलती नजर आती हैं, जो इस वृक्ष की भव्यता को और बढ़ा देती हैं।
ग्रामीणों के अनुसार यह वटवृक्ष लगभग ढाई सौ वर्ष पुराना है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पीढ़ियां बदल गईं। लेकिन यह पेड़ आज भी उसी मजबूती से गांव की शान बनकर खड़ा है।
संत दयापुरी बाबा के स्थान के समीप होने के कारण कभी इसकी कटाई या छंटाई नहीं की गई। इसी वजह से इसका आकार लगातार फैलता गया और आज यह गांव की पहचान बन चुका है।
गांव के लोग इस वटवृक्ष को सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि अपनी धरोहर मानते हैं। धार्मिक अवसरों पर यहां पूजा-अर्चना की जाती है और रक्षा सूत्र बांधे जाते हैं।

सेमरिया ओझा पट्टी का विशाल वटवृक्ष बना प्रकृति प्रेम की मिसाल
गर्मी के दिनों में इसकी घनी छांव ग्रामीणों को राहत देती है। बच्चे जहां इसकी जड़ों के बीच खेलते नजर आते हैं। वहीं बुजुर्ग घंटों इसकी छांव में बैठकर समय बिताते हैं।
रिटायर्ड सीआरपीएफ कमांडेंट प्रेमी हीरालाल ओझा बताते हैं कि यह वटवृक्ष गांव के इतिहास और सम्मान का प्रतीक है। संभवतः गांव बसने के समय से ही यह पेड़ यहां मौजूद है।
वही वीरेंद्र ओझा की माने तो वटवृक्ष का मूल जड़ कौन सा है इसका पता किसी को भी नही। पैक्स अध्यक्ष चंचल ओझा के अनुसार पीढ़ियों से लोग यही सुनते आ रहे हैं कि पेड़ इसी तरह से दिखता है।