लाठी लेकर अंग्रेजों की टुकड़ी के सामने खड़े हो गए बिहार के सूर्यदेव, सीने पर गोली लगी फिर भी बोलते रहे...भारत माता की जय
सूर्यदेव कुमार ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कोईलवर, भोजपुर में अंग्रेजों को लाठी से चुनौती दी और गोली लगने के बाद भी 'भारत माता की जय' कहते हुए शह ...और पढ़ें
HighLights
सूर्यदेव कुमार ने 1942 में अंग्रेजों को लाठी से चुनौती दी।
बहियारा गांव में गोली लगने के बाद भी नारे लगाते रहे।
आधिकारिक सूची में नाम न होने से परिवार को पीड़ा।
नीरज कुमार, कोईलवर (भोजपुर)। अगस्त क्रांति की जब भी चर्चा होती है, भोजपुर के कोईलवर की धरती पर लिखी गई एक ऐसी वीरगाथा सामने आती है, जिसे इतिहास में वह पहचान नहीं मिल सकी जिसकी वह हकदार थी। यह कहानी चांदी गांव के युवा सूर्यदेव कुमार उर्फ सुखदेव पंडित की है, जिन्होंने हाथ में महज एक लाठी लेकर अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दे दी थी।
आठ अगस्त 1942 की शाम अंग्रेजों की एक टुकड़ी बहियारा हाता सुरंग से आरा की ओर बढ़ रही थी। बहियारा गांव के समीप सूर्यदेव अकेले अंग्रेज सिपाहियों के सामने खड़े हो गए। उन्होंने निर्भीक होकर ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए।
सामने अंग्रेजी टुकड़ी, हाथ में सिर्फ लाठी
एक अकेले क्रांतिकारी की इस बेखौफ चुनौती से अंग्रेज अधिकारी बौखला गए। उन्होंने गोली चलाने का आदेश दे दिया। गोली लगने के बावजूद सूर्यदेव पीछे नहीं हटे और आखिरी समय तक देशभक्ति के नारे लगाते रहे।
अंग्रेज सिपाहियों ने उन पर और भीषण हमला किया। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उनका हौसला नहीं टूटा। कुछ ही देर बाद मातृभूमि के लिए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
बेटे के शहीद होने की खबर सुन दौड़े माता-पिता
घटना की सूचना मिलने के बाद उनकी मां क्रांति देवी और पिता सुदर्शन कुमार बहियारा पहुंचे। लेकिन तब तक उनका लाल देश की आजादी के लिए बलिदान दे चुका था।
वर्ष 1917 में जन्मे सूर्यदेव कुमार महात्मा गांधी के आह्वान से प्रेरित होकर भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए थे। उनके साथ कपिलदेव राम, ब्रजेश नंदन प्रसाद वर्मा, मिठू महतो, हातिम अली, अयोध्या प्रसाद और राम प्रसाद व अन्य साथी भी आंदोलन से जुड़े थे।
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बलिदान के बाद भी गुमनामी में रह गया परिवार
सूर्यदेव कुमार के पुत्र शिव प्रसाद और पौत्र वीरेंद्र कुमार व सुरेंद्र कुमार बताते हैं कि आजादी की लड़ाई में सर्वोच्च बलिदान देने के बावजूद उनका नाम स्वतंत्रता सेनानियों की आधिकारिक सूची में दर्ज नहीं है।
हालांकि, कोईलवर प्रखंड सह अंचल कार्यालय परिसर में लगे शिलापट्ट पर छह स्वतंत्रता सेनानियों के नाम अंकित हैं, जिनमें सूर्यदेव कुमार का नाम भी शामिल है। यही शिलापट्ट आज उनके अदम्य साहस की गवाही देता है।
शहादत के पांच साल बाद पत्नी ने भी छोड़ा साथ
स्वजनों के अनुसार, सूर्यदेव कुमार के बलिदान के करीब पांच वर्ष बाद उनकी पत्नी पूर्णमसो कुंवर का भी निधन हो गया। इसके बाद परिवार गुमनामी में जीवन बिताता रहा।
कोईलवर के लोग आज भी सूर्यदेव की वीरता की कहानी याद करते हैं। परिवार की पीड़ा यह है कि देश की आजादी के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर को वह सम्मान और सरकारी श्रद्धांजलि नहीं मिल सकी, जिसके वे हकदार थे।