जब मंत्री ने लौटा दी सरकारी गाड़ी, साइकिल से नापा पूरा इलाका; बक्सर की प्रेरक कहानी
बक्सर के पूर्व मंत्री ऋषिकेश तिवारी और सेवानिवृत्त फार्मासिस्ट राजाराम ने अपनी जीवनशैली से ऊर्जा संरक्षण और सादगी का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है। मं ...और पढ़ें

साइकिल से जाते राजाराम। जागरण
HighLights
मंत्री ऋषिकेश तिवारी ने सरकारी गाड़ी लौटाकर साइकिल चलाई।
फार्मासिस्ट राजाराम 24 किमी साइकिल से ड्यूटी जाते थे।
इनकी जीवनशैली ऊर्जा संरक्षण और सादगी की मिसाल है।
संवाद सहयोगी, ब्रह्मपुर (बक्सर)। वैश्विक स्तर पर बढ़ते ऊर्जा संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हाल में देशवासियों से ईंधन बचाने तथा पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने की अपील की गई है।
प्रधानमंत्री के इस आह्वान के बाद देशभर में साइकिल चलाने, पैदल यात्रा करने और अनावश्यक ईंधन खपत कम करने को लेकर कई सकारात्मक पहलें सामने आ रही हैं।
हालांकि, बक्सर जिले के ब्रह्मपुर और सिमरी क्षेत्र में ऐसे उदाहरण दशकों पहले से मौजूद रहे हैं, जिन्होंने बिना किसी अभियान या सरकारी संदेश के अपने जीवन से ऊर्जा संरक्षण, सादगी और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश दिया।
इनमें पूर्व श्रम मंत्री ऋषिकेश तिवारी और सेवानिवृत्त फार्मासिस्ट राजाराम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
मंत्री रहे, लेकिन साइकिल नहीं छोड़ी
ब्रह्मपुर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए और बिहार सरकार में श्रम मंत्री रहे स्वर्गीय ऋषिकेश तिवारी का जीवन सादगी और जनसरोकारों का पर्याय माना जाता है।
संपन्न परिवार से आने और सत्ता के शीर्ष पदों पर रहने के बावजूद उन्होंने कभी राजनीतिक वैभव को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।
उनके पुत्र एवं भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य धीरेंद्र तिवारी उर्फ छोटे तिवारी बताते हैं कि मंत्री रहते हुए भी उनके पिता ने कभी सरकारी गाड़ी और सुरक्षा कर्मियों का निजी उपयोग नहीं किया।
वे अधिकतर यात्राएं सामान्य यात्रियों की तरह ट्रेन से करते थे। यदि किसी सरकारी कार्यक्रम के कारण सरकारी वाहन से क्षेत्र में आना पड़ता था, तो वे चौक पर ही उतर जाते और वाहन व सुरक्षा कर्मियों को तत्काल पटना वापस भेज देते थे।
घर में निजी वाहन उपलब्ध होने के बावजूद क्षेत्र भ्रमण, जनसंपर्क और लोगों से मिलने-जुलने के लिए वे साइकिल का ही उपयोग करते थे। ग्रामीण इलाकों की गलियों और पगडंडियों पर साइकिल से घूमते हुए जनता की समस्याएं सुनना उनकी कार्यशैली का हिस्सा था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उनकी सादगी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि उस दौर के बड़े-बड़े अपराधी और बाहुबली भी उनके नाम से दूरी बनाकर रखते थे।
आज जब ऊर्जा संरक्षण वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है, तब ऋषिकेश तिवारी का जीवन यह बताता है कि संसाधनों का संयमित उपयोग केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन की शुचिता के लिए भी आवश्यक है।
24 किलोमीटर साइकिल चलाकर पहुंचते थे ड्यूटी
सादगी और ऊर्जा संरक्षण की दूसरी प्रेरक मिसाल सिमरी प्रखंड के दुल्लहपुर निवासी सेवानिवृत्त फार्मासिस्ट राजाराम हैं। उन्होंने जीवनभर साइकिल को ही अपना सबसे विश्वसनीय साथी बनाए रखा।
सरकारी सेवा के दौरान उन्होंने कभी मोटरसाइकिल या अन्य निजी वाहन का उपयोग नहीं किया। प्रतिदिन दुल्लहपुर से जिला मुख्यालय तक लगभग 22 से 24 किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय कर ड्यूटी पर पहुंचना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। शाम को उतनी ही दूरी तय कर वे वापस घर लौटते थे।
चिलचिलाती गर्मी, कड़ाके की ठंड अथवा मूसलाधार बारिश जैसी परिस्थितियां भी उनके संकल्प को कभी कमजोर नहीं कर सकीं।
1990 के दशक में सरकारी सेवा में आने के बाद उन्होंने महदह, अनुमंडल अस्पताल, सदर अस्पताल और शहरी पीएचसी समेत कई स्वास्थ्य संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं। सेवा के अंतिम वर्षों में उनका स्थानांतरण सहरसा हुआ, जहां से इसी वर्ष जनवरी में वे सेवानिवृत्त हुए।
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दिलचस्प बात यह है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी उनकी जीवनशैली में कोई बदलाव नहीं आया। आज भी वे अपने दैनिक कार्यों और आवागमन के लिए साइकिल का ही उपयोग करते हैं।
उनका मानना है कि साइकिल न केवल ईंधन की बचत करती है, बल्कि शरीर को स्वस्थ और मन को सक्रिय भी रखती है।
नई पीढ़ी के लिए सीख
स्थानीय लोगों का मानना है कि ऋषिकेश तिवारी और राजाराम जैसे व्यक्तित्व यह साबित करते हैं कि सादगी, अनुशासन और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का कोई विकल्प नहीं है।
आज जब पूरी दुनिया ऊर्जा संकट और पर्यावरण संरक्षण की चुनौतियों से जूझ रही है, तब इन दोनों की जीवनशैली नई पीढ़ी के लिए एक प्रेरक संदेश और व्यवहारिक मार्गदर्शिका बनकर सामने आती है।
इनकी कहानी बताती है कि ऊर्जा संरक्षण केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में अपनाई गई छोटी-छोटी आदतों से भी संभव है। यही आदतें भविष्य के लिए टिकाऊ और जिम्मेदार समाज की नींव रख सकती हैं।