100 साल बाद भी अमर है 'देहाती दुनिया'; शिवपूजन सहाय की यह कृति क्यों मानी जाती है हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास?
आचार्य शिवपूजन सहाय के कालजयी उपन्यास 'देहाती दुनिया' ने प्रकाशन के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास माना जाता है, जो ग्रामीण ...और पढ़ें

आचार्य शिवपूजन सहाय की कालजयी कृति।
HighLights
'देहाती दुनिया' के प्रकाशन के 100 वर्ष पूरे।
यह हिंदी का प्रथम आंचलिक उपन्यास माना जाता है।
ग्रामीण जीवन, संस्कृति और यथार्थ का जीवंत चित्रण।
जागरण संवाददाता, बक्सर। भोजपुरी और हिंदी साहित्य को नए आयाम देने वाले आचार्य शिवपूजन सहाय की नौ अगस्त को जयंती है। उनके कालजयी उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ के प्रकाशन के 100 वर्ष पूरे हो गए हैं।
1926 में प्रकाशित यह रचना हिंदी का प्रथम आंचलिक उपन्यास मानी जाती है। साहित्यकार और विद्वान इसे आंचलिकता की नींव बताते हुए ग्रामीण जीवन, संस्कृति, भाषा और सामाजिक यथार्थ का जीवंत दस्तावेज मानते हैं।
आचार्य शिवपूजन सहाय को याद कर रहा हिंदी और भोजपुरी का साहित्य जगत
इससे प्रेरणा लेकर बाद के रचनाकारों ने आंचलिक उपन्यासों की मजबूत इमारत खड़ी की। साहित्यकार एकमत हैं कि देहाती दुनिया आज भी प्रासंगिक है और हिंदी आंचलिक साहित्य की आधारशिला बनी हुई है।
आचार्य शिवपूजन सहाय का जन्म 9 अगस्त 1893 को बिहार के बक्सर जिले के उनवास गांव में हुआ था। वे उपन्यासकार, कहानीकार, संपादक और पत्रकार के रूप में सक्रिय रहे।
मतवाला, माधुरी, गंगा और जागरण जैसी पत्रिकाओं का संपादन कर उन्होंने हिंदी गद्य को समृद्ध किया। 21 जनवरी 1963 को पटना में उनका निधन हुआ। इस कालखंड में उन्होंने साहित्य को जिम्मेदार और जन-संबद्ध बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
जिले के साहित्यकार और कथाकार उन्हें इन शब्दों में श्रद्धा निवेदित कर रहे हैं:-
देहाती दुनिया संवेदना, भाव, भाषा, कला, शिल्प, संवाद, चरित्र, क्षेत्र और संस्कृति के धरातल पर आंचलिक उपन्यास है। यह हिंदी का पहला आंचलिक और भारतीय शिल्प का प्रथम देशी उपन्यास है। सौ वर्ष पूर्ण कर पाठक चेतना में बने रहना इसके महत्व को सिद्ध करता है।
डाॅ. वैरागी प्रभाष चतुर्वेदी, महासचिव, भोजपुरी साहित्य मंडल, बक्सर
शिवपूजन सहाय ने साहित्य को जिम्मेदार बनाया। प्रेमचंद से पहले 1926 में ही देहाती दुनिया में ग्रामीण जीवन चित्रित कर उसे भारत का प्रमाणिक दस्तावेज बनाया। संपादक और पत्रकार के रूप में उन्होंने गद्य को नई दिशा दी। उनकी लोकप्रियता बक्सर से पूरे साहित्य जगत तक फैली।
प्रो. छाया चौबे, महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय, बक्सर
इस कृति से भोजपुरी अंचल की सांस्कृतिक विरासत, रीति-रिवाज, परंपरा, शादी-विवाह, लोकगीत और ठेठ भाषा के मुहावरे-लोकोक्तियां जीवंत मिलते हैं। भाषा सजीव, मर्मस्पर्शी और प्रभावोत्पादक है। शताब्दी वर्ष में यशस्वी लेखक को सादर श्रद्धांजलि।
डाॅ. अरुण मोहन भारवि, अध्यक्ष, भोजपुरी साहित्य मंडल, बक्सर
आचार्य शिवपूजन सहाय की देहाती दुनिया मिट्टी की महक, लोक जीवन की धड़कन और भारतीय ग्राम्य जीवन का जीवंत आख्यान है। तत्कालीन ग्राम्य जीवन को समझने का इससे बेहतर माध्यम हो ही नहीं सकता है। यह इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन चुका है।
कृष्ण कुमार, कथाकार
शिवपूजन सहाय का साहित्य विपुल और बहुआयामी है। देहाती दुनिया को पढ़ना ताजगी से भर देता है। इस महान कृति से गुजरते हुए पाठकों को भोजपुरी अंचल की गौरवमयी सांस्कृतिक विरासत से रूबरू होने, उससे जुड़ने की सुखद अनुभति होती है।
श्रीभगवान पांडेय, महासचिव, सिद्धाश्रम साहित्य न्यास परिषद
देहाती दुनिया भाषा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह लोक आख्यानों, लोक-जीवन, संघर्ष, उत्सवधर्मिता और बाल मनोविज्ञान का उपन्यास है। ऐसी ऐतिहासिक कृति और इसके रचयिता को वास्तविक सम्मान नहीं मिल पाया है।
कुशध्वज सिंह ‘मुन्ना’, लेखक
आचार्य सहाय अपने समय और समाज के सजग प्रहरी हैं। देहाती दुनिया पढ़ना फिल्म जैसा दृश्य अंकित करता है। इसमें लोक जीवन का संवाद है। बार-बार पढ़ने पर भी यह एक नई अनुभूति देता है।
संजय सागर, कवि-लेखक
यह भारतीय समाज की सांस्कृतिक निरंतरता, नैतिक मूल्यों और लोक जीवन की गरिमा की प्रभावशाली व्याख्या है। केवल अपने समय का दस्तावेज नहीं, बदलते युग में सामाजिक यथार्थ का कालजयी दर्पण है।
लक्ष्मी कांत मुकुल, कवि
इसमें बिहार के गांवों का सजीव चित्रण है। ‘माता का आंचल’ में बचपन की मस्ती और खेल बेहतरीन हैं। किसानों की गरीबी, शोषण, अंधविश्वास और कुरीतियों का यथार्थ चित्रण इसे ग्रामीण भारत की समस्याओं का आईना बनाता है। भाषा सरल, शैली वर्णनात्मक है।
डाॅ. मीरा सिंह ‘मीरा’, साहित्यकार