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    मिथिला में घट रहा देसी मछली का स्वाद, बंगाल की मछलियों पर बढ़ती निर्भरता

    By Amit Kumar Edited By: Dharmendra Singh
    Updated: Mon, 18 May 2026 04:32 PM (IST)

    मिथिला में देसी मछली उत्पादन में भारी गिरावट आई है, जिससे स्थानीय बाजार अब पश्चिम बंगाल से आने वाली मछलियों पर अत्यधिक निर्भर हो गए हैं। जलवायु परिवर् ...और पढ़ें

    इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

    इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

    HighLights

    1. मिथिला में देसी मछली उत्पादन में भारी गिरावट।

    2. स्थानीय बाजार अब बंगाल की मछलियों पर निर्भर।

    3. मखाना खेती और जलवायु परिवर्तन मुख्य कारण।

    अमित कुमार तारडीह (दरभंगा) : 'पग-पग पोखर, माछ-मखान' और पारंपरिक खान पीन वाली संस्कृति की पहचान रखने वाली मिथिला अब धीरे-धीरे बंगाल से आने वाली मछलियों पर निर्भर होती जा रही है।

    कभी गांव-गांव के पोखरों, तालाबों और नदियों में आसानी से मिलने वाली देसी मछलियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं। मौसम में बदलाव, अल्पवृष्टि और जलस्रोतों के सिकुड़ने के कारण पारंपरिक मछली उत्पादन पर गहरा असर पड़ा है।

    यही वजह है कि स्थानीय बाजारों में मांग के अनुरूप स्थानीय देसी मछली उपलब्ध नहीं हो पा रही है और व्यापारियों को पश्चिम बंगाल से बड़ी मात्रा में मछलियां मंगानी पड़ रही हैं।

    मछली व्यापारियों की माने तो मिथिला क्षेत्र के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर और सुपौल समेत कई जिलों के बाजारों में इन दिनों बंगाल से आयातित रहू, कतला, सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प एवं अन्य प्रजातियों की मछलियां अधिक बिक रही हैं।

    स्थानीय मछुआरों का कहना है कि पहले गांव के तालाबों और नदियों से इतनी मछली निकल जाती थी कि बाहरी राज्यों पर निर्भरता की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन अब नदियों में जलस्तर कम होने और तालाबों के सूखने से उत्पादन तेजी से घटा है।

    विशेषज्ञों के अनुसार मौसम परिवर्तन इसका बड़ा कारण बनकर उभरा है। पहले जहां समय पर वर्षा होने से तालाब और जलाशय भरे रहते थे, वहीं अब अल्पवृष्टि के कारण जलस्रोतों में पानी की कमी बनी रहती है।

    इससे मछलियों के प्राकृतिक प्रजनन पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। कई पारंपरिक देसी प्रजातियां जैसे पोठी, सिंगही, मागुर, गैचा,भुना और रेवा अब समाप्ति की कगार पर पहुंच गई हैं।

    इधर मखाना की बढ़ती खेती भी मछली उत्पादन में कमी का एक बड़ा कारण बन रही है।विश्व स्तर पर मखाना की मांग और लाभ बढ़ने के बाद बड़ी संख्या में किसान अब तालाबों में मछली पालन के बजाय मखाना उत्पादन को प्राथमिकता देने लगे हैं।

    जिन तालाबों में पहले मछलियां पाली जाती थीं, वहां अब मखाना की खेती हो रही है। किसानों का मानना है कि मखाना से उन्हें अधिक मुनाफा मिलता है, जबकि मछली पालन में लागत और जोखिम दोनों ज्यादा हैं।

    स्थानीय मछली विक्रेताओं के अनुसार बंगाल से आने वाली मछलियों के बिना बाजार की मांग पूरी करना मुश्किल हो गया है। दरभंगा और आसपास के बाजारों में प्रतिदिन कई क्विंटल मछलियां बंगाल से पहुंच रही हैं।

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    अलीपुर विधानसभा के तीनों प्रखंडों में लगभग तीस क्विंटल मछली की खपत प्रतिदिन है। प्रखंड में प्रतिदिन बंगाल से पिकअप के माध्यम से दो से तीन गाड़ी जिंदा मछली पहुंचती है लग्न में इसकी मांग और ज्यादा बढ़ जाती है।

    हालांकि उपभोक्ताओं का कहना है कि बंगाल की मछलियों में वह स्वाद नहीं है जो मिथिला की देसी मछलियों में होता है। साथ ही बंगाल या बाहर  से आने वाली मछलियों में उसे आकर्षक और ताजा बनाए रखने के लिए खतरनाक रसायन का प्रयोग भी किया जाता है जो सेहत के लिए नुकसानदायक होता है इसके बावजूद मांग की पूर्ति के लिए इसका आयात काफी है।

    जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते तालाबों के संरक्षण, मत्स्य पालन को बढ़ावा देने और जलस्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में ठोस पहल नहीं की गई तो मिथिला की पारंपरिक “माछ” संस्कृति केवल कहावतों तक सीमित होकर रह जाएगी।