बिहार का 'शिक्षा वाला गांव'; जहां से निकले वैज्ञानिक, प्रधान सचिव और दर्जनों अधिकारी, कैसे बदली तस्वीर?
गया जिले का बहेरा गांव शिक्षा के दम पर गरीबी से निकलकर सामाजिक बदलाव की मिसाल बन गया है। कभी बदहाल रहा यह गांव अब शिक्षित युवाओं, वैज्ञानिकों और अधिका ...और पढ़ें

हरियाणा के प्रधान सचिव राजीव रंजन काली शर्ट में और अमेरिका के सीनियर साइंटिस्ट राजेश रंजन व लेखक विनोद अंबष्ठ। सौ. ग्रामीण
HighLights
1934 में स्थापित पहले स्कूल से बदलाव की शुरुआत हुई।
बहेरा गांव से निकले वैज्ञानिक, अधिकारी और प्रसिद्ध लेखक।
शिक्षा ने बदली गांव की सामाजिक सोच और जीवन स्तर।
जागरण संवाददाता, गयाजी। गया जिले के इमामगंज प्रखंड से करीब 75 किलोमीटर दूर स्थित बहेरा गांव आज बिहार में शिक्षा आधारित सामाजिक बदलाव की ऐसी मिसाल बन चुका है, जिसकी चर्चा पूरे प्रदेश में हो रही है।
कभी यह गांव गरीबी, संसाधनों की कमी और बदहाल रास्तों के लिए जाना जाता था। आज यही गांव अपने शिक्षित युवाओं, सरकारी अधिकारियों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और डॉक्टरों की लंबी फेहरिस्त के कारण नई पहचान बना चुका है।
जिस गांव के बच्चे कभी फटे बस्ते और नंगे पांव पांच किलोमीटर पैदल चलकर पढ़ने जाते थे, उसी गांव का एक बेटा आज अमेरिका में वैज्ञानिक है, दूसरा हरियाणा में मुख्य चुनाव सचिव के पद पर कार्यरत है।
गांव के दर्जनों युवा शिक्षक, इंजीनियर, बैंक अधिकारी, रेलवे अधिकारी और डॉक्टर बनकर देशभर में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं।
बहेरा की यह यात्रा केवल सफलता की कहानी नहीं, बल्कि शिक्षा की ताकत और सामूहिक संकल्प का जीवंत उदाहरण है।
1934 में जली शिक्षा की पहली लौ
बहेरा गांव के परिवर्तन की नींव वर्ष 1934 में पड़ी, जब यहां पहला प्राथमिक विद्यालय स्थापित हुआ। उस दौर में ग्रामीण समाज में शिक्षा को विशेष महत्व नहीं दिया जाता था। अधिकांश परिवार बच्चों को पढ़ाने की बजाय खेती-बाड़ी और घरेलू कार्यों में लगाना ही बेहतर समझते थे।
ऐसे समय में गांव के समाजसेवी स्वर्गीय भेषनारायण दांगी ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाने का बीड़ा उठाया।
वे घर-घर जाकर अभिभावकों को समझाते थे कि गरीबी से बाहर निकलने का सबसे मजबूत रास्ता शिक्षा ही है। उन्होंने लोगों को बच्चों को नियमित स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे गांव की सोच बदलने लगी और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ती चली गई।

(उत्क्रमत उच्च माध्यमिक विद्यालय बहेरा-चुआवार।)
पांच किलोमीटर पैदल, फिर भी नहीं टूटा हौसला
प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे पढ़ाई की सुविधा गांव में नहीं थी। हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए विद्यार्थियों को पकरी-गुरिया और रानीगंज तक रोज करीब पांच किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था।
रास्ते कच्चे थे, बरसात में कीचड़ और गर्मी में तपती जमीन। बावजूद इसके गांव के छात्रों ने हार नहीं मानी।
इसी कठिन संघर्ष के दौर से निकलकर स्वर्गीय महेष प्रसाद दांगी, स्वर्गीय बदरी नारायण, रामदास साहू, कृष्णकांत, जगदीश प्रसाद और नेमन प्रसाद जैसे लोगों ने शिक्षक बनकर नई पीढ़ी के लिए रास्ता तैयार किया।
गांव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं कि यदि उस पीढ़ी ने संघर्ष छोड़ दिया होता तो बहेरा आज इस मुकाम पर नहीं पहुंचता।
गांव से निकले वैज्ञानिक, सचिव और लेखक
शिक्षा की इस अलख का असर अब पूरे गांव की पहचान बन चुका है। गांव के राजीव रंजन हरियाणा में मुख्य चुनाव सचिव के पद पर कार्यरत हैं।
वहीं राजेश रंजन अमेरिका में वैज्ञानिक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसी गांव के विनोद कुमार अंबष्ट रसायन शास्त्र के प्रसिद्ध लेखक हैं, जिन्हें राजीव गांधी एक्सीलेंसी अवार्ड और द बेस्ट सिटिजन ऑफ इंडिया जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं।
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इन उपलब्धियों ने गांव के बच्चों में बड़ा सपना देखने का आत्मविश्वास पैदा किया है। अब यहां के युवा केवल नौकरी पाने की नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी और शोधकर्ता बनने का लक्ष्य लेकर तैयारी कर रहे हैं।
आंकड़े खुद बयान कर रहे बदलाव
बहेरा गांव आज शिक्षा आधारित सामाजिक परिवर्तन का मॉडल बन चुका है। वर्तमान में गांव से
16 शिक्षक
15 इंजीनियर
3 डॉक्टर
3 बैंक मैनेजर
5 रेलवे अधिकारी
4 सैनिक
1 सचिवालय अधिकारी
देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब पूरे गांव में मैट्रिक पास व्यक्ति ढूंढना मुश्किल होता था, लेकिन आज लगभग हर घर में स्नातक या उससे अधिक पढ़े-लिखे युवा हैं।
शिक्षा का विस्तार बना बदलाव की सबसे बड़ी वजह
गांव के शिक्षकों संजय कुमार, अंबुज कुमार गुप्ता, भूपेंद्र प्रसाद सिन्हा, विंदेश्वरी यादव और अशोक कुमार बताते हैं कि वर्ष 1978 में प्राथमिक विद्यालय को मध्य विद्यालय का दर्जा मिला। इसके बाद शिक्षा का दायरा लगातार बढ़ता गया।
वर्ष 2015 में गांव में प्लस-टू उच्च विद्यालय की स्थापना हुई, जिससे आसपास के विद्यार्थियों को इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए दूर नहीं जाना पड़ता। इसका सीधा लाभ छात्र-छात्राओं को मिला और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का माहौल भी विकसित हुआ।
आज गांव के युवा यूपीएससी, बीपीएससी, रेलवे, बैंकिंग, नीट और इंजीनियरिंग जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अब बेटियों की शिक्षा को भी समान प्राथमिकता दी जा रही है। अभिभावक उन्हें उच्च शिक्षा दिलाने के लिए पूरी गंभीरता से आगे आ रहे हैं।
शिक्षा ने बदली गांव की तस्वीर
बहेरा में शिक्षा का असर केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहा। इससे पूरे गांव की सामाजिक सोच, रहन-सहन और जीवन स्तर में व्यापक परिवर्तन आया है।
आज गांव में पक्के मकान हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र हैं और लगभग हर परिवार शिक्षा को अपनी पहली प्राथमिकता मानता है।
गांव के बुजुर्ग गर्व से कहते हैं, "पहले हमारे गांव के लोग मजदूरी करने बाहर जाते थे, अब हमारे बच्चे अधिकारी बनकर गांव और राज्य का नाम रोशन कर रहे हैं।"
पूरे बिहार के लिए प्रेरणा
बहेरा आज उन चुनिंदा गांवों में शामिल हो चुका है, जहां शिक्षा सामाजिक क्रांति का आधार बनी है। यह गांव साबित करता है कि यदि समाज शिक्षा को अपना लक्ष्य बना ले तो सीमित संसाधनों के बावजूद असंभव दिखने वाला बदलाव भी संभव है।
बहेरा की कहानी केवल एक गांव की सफलता नहीं, बल्कि उस बिहार की नई तस्वीर है जो संघर्ष, शिक्षा और मेहनत के दम पर अपनी पहचान बदल रहा है। यह गांव हर उस बस्ती के लिए संदेश है जो बदलाव का सपना देखती है—
"अगर शिक्षा की लौ जल जाए, तो अंधेरा कितना भी गहरा हो, उजाला अपना रास्ता बना ही लेता है।"