₹15000 DBT और 50% अनुदान: गया में वर्मी-कंपोस्ट से बदली खेती की तस्वीर, जैविक राह पर आगे बढ़े किसान
गया जिले में परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत किसान रासायनिक खेती छोड़कर जैविक पद्धति अपना रहे हैं। वर्मी-कंपोस्ट पिट निर्माण और अनुदान से किसानों की ...और पढ़ें

गया में वर्मी-कंपोस्ट से बदली खेती की तस्वीर, जैविक राह पर आगे बढ़े किसान

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जागरण संवाददाता, गयाजी। भारत सरकार की महत्वाकांक्षी पारंपरिक कृषि विकास योजना जिले के किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही है। जैविक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना का असर अब जमीनी स्तर पर स्पष्ट दिखाई देने लगा है।
नगर प्रखंड में किसान धीरे-धीरे रासायनिक खेती से दूरी बनाकर जैविक पद्धति की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जिससे खेती अधिक लाभकारी और टिकाऊ बन रही है।
नगर प्रखंड के बारा, नौगढ़, नैली आदि गांव के दस चयनित किसानों के बीच इस योजना के तहत 30 यूनिट पक्का वर्मी-कंपोस्ट पीट का निर्माण कराया गया है। प्रत्येक किसान को तीन-तीन यूनिट उपलब्ध कराए गए हैं, जिससे वे स्वयं जैविक खाद तैयार कर सकें।
इस पहल के पीछे सरकार की मंशा किसानों को आत्मनिर्भर बनाना और खेती की लागत को कम करना है। योजना के अंतर्गत प्रत्येक यूनिट पर 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया गया है। इस प्रकार प्रत्येक किसान को 15,000 रुपये की सहायता राशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी के माध्यम से सीधे उनके बैंक खातों में भेजी गई है।
इस आर्थिक सहयोग से किसानों को वर्मी-कंपोस्ट तैयार करने में काफी सहूलियत मिली है। पहले जहां किसानों को बाजार से महंगे रासायनिक खाद खरीदने पड़ते थे, वहीं अब वे अपने खेतों के लिए खुद जैविक खाद तैयार कर रहे हैं। इससे न केवल उनकी लागत में कमी आई है, बल्कि फसलों की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
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किसानों का कहना है कि वर्मी-कंपोस्ट के उपयोग से मिट्टी अधिक उपजाऊ बनी है और फसल की पैदावार पहले की तुलना में बेहतर हुई है।
विशेषज्ञों की मानें तो वर्मी-कंपोस्ट मिट्टी के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। इसमें मौजूद सूक्ष्म जीव मिट्टी की संरचना को सुधारते हैं और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। इसके नियमित उपयोग से मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है, जिससे सिंचाई की आवश्यकता भी कम हो जाती है। इसके साथ ही यह पर्यावरण के अनुकूल है और भूमि की दीर्घकालिक उर्वरता को बनाए रखने में सहायक है।
पारंपरिक खेती से बहुआयामी लाभ
वर्मी-कंपोस्ट के नियमित प्रयोग से खेत की मिट्टी की सेहत में व्यापक सुधार होता है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है, जिससे भूमि और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहते हैं। जैविक खेती से उत्पन्न फसलें स्वास्थ्य के लिए बेहतर मानी जाती हैं और बाजार में इनकी मांग भी अधिक रहती है। परिणामस्वरूप किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलता है, जिससे उनकी आय में वृद्धि होती है।
पारंपरिक कृषि विकास योजना किसानों के लिए एक नई दिशा और उम्मीद लेकर आई है। यदि इसी तरह योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन होता रहा, तो आने वाले समय में पूरे क्षेत्र में जैविक खेती का विस्तार होगा। इससे न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी, बल्कि कृषि क्षेत्र में स्थायी और पर्यावरण अनुकूल विकास को भी बल मिलेगा।
सभी किसानों को वर्मी-कंपोस्ट यूनिट अवश्य बनाना चाहिए। इससे उनकी आय में काफी बचत होगी। खेत में विभिन्न तरह के फसल उगाने के दरम्यान कंपोस्ट का प्रयोग करने से फसल काफी अच्छा होगा। खाने में भी स्वादिष्ट लगेगा। बाजार में बिक्री भी ऊंचे दाम पर होगी। - अम्बुज कुमार, कृषि समन्वयक