एक पहल ने बदली सोच: छप्पर के स्कूल से उठी रोशनी, साइकिलों पर उड़ान भर रहीं गांव की बेटियां
बाराचट्टी के बुमेर टोला अम्बातरी में मालो कुमारी ने लड़कियों की शिक्षा में क्रांति ला दी है। 2010 में शादी के बाद उन्होंने गांव में शिक्षा की कमी महसू ...और पढ़ें

मालो कुमारी
HighLights
मालो कुमारी ने 2012 में छप्पर के नीचे स्कूल शुरू किया।
हजारों बच्चों को शिक्षित कर बेटियों को मैट्रिक तक पहुंचाया।
अब बेटियां आत्मविश्वास से साइकिलों पर स्कूल जा रही हैं।
संवाद सूत्र, बाराचट्टी (गया)। सुबह की हल्की धूप में बुमेर टोला अम्बातरी की कच्ची पगडंडियों पर साइकिलों की कतार अब आम दृश्य बन चुकी है।
यह सिर्फ बेटियों का स्कूल जाना नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक बदलाव की कहानी है।
जहां कभी बेटियों को घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी, वहीं अब वे उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ रही हैं। इस परिवर्तन के केंद्र में Malo Kumari हैं।
2010 में शुरू हुई बदलाव की कहानी
वर्ष 2010 में मालो कुमारी की शादी इस गांव में हुई थी। स्नातक शिक्षित मालो ने गांव में शिक्षा की स्थिति बेहद कमजोर पाई।
उनके पति Kesar Kumar बच्चों को घर पर ट्यूशन पढ़ाते थे। मालो भी उनके साथ जुड़ गईं, लेकिन उन्होंने एक बड़ी कमी महसूस की।
बेटियों की शिक्षा लगभग शून्य थी
गांव में पढ़ने वाले बच्चों में बेटियों की संख्या लगभग न के बराबर थी। अनुसूचित जाति बहुल इस गांव में बेटियों को घरेलू कामों तक सीमित रखा जाता था।
मालो कुमारी ने इस सोच को बदलने का संकल्प लिया। उन्होंने शिक्षा को बदलाव का माध्यम बनाने का फैसला किया।
छप्पर के नीचे शुरू हुआ स्कूल
वर्ष 2012 में उन्होंने NABARD के सहयोग से निःशुल्क विद्यालय की शुरुआत की। यह स्कूल किसी पक्के भवन में नहीं, बल्कि छप्पर के नीचे चलता था।
बच्चों के लिए दोपहर में भोजन की भी व्यवस्था की गई। संसाधनों की कमी के बावजूद पढ़ाई जारी रही।
विरोध के बीच महिलाओं ने संभाली कमान
शुरुआत में गांव के पुरुषों ने इस पहल का विरोध किया। लेकिन महिलाओं ने मालो कुमारी का खुलकर साथ दिया।
चिंता देवी और गीरजा देवी जैसी महिलाओं ने बेटियों को पढ़ाने की पहल की।
नदी किनारे जमीन समतल कर बांस और छप्पर से स्कूल तैयार किया गया।
हजारों बच्चों तक पहुंची शिक्षा की रोशनी
मालो कुमारी ने अब तक एक हजार से अधिक बच्चों को शिक्षित किया है। उन्होंने डेढ़ सौ से ज्यादा बेटियों को मैट्रिक तक पहुंचाया।
सात सौ से अधिक बेटियों को पढ़ाई के प्रति जागरूक किया गया। उनके प्रयासों से अभिभावकों की सोच में बड़ा बदलाव आया।
खेल और शिक्षा दोनों में आगे बेटियां
मालो ने बेटियों को खेल के क्षेत्र में भी प्रोत्साहित किया। उनके द्वारा जीते गए कप और ट्रॉफियां आज भी प्रेरणा देती हैं।
बेटियां अब आत्मविश्वास के साथ विभिन्न गतिविधियों में भाग ले रही हैं। गांव में उनका मनोबल लगातार बढ़ रहा है।
अब शिक्षा बना जनआंदोलन
वर्तमान में वे 'जीवन संगम संस्था' के माध्यम से 70 बच्चों को पढ़ा रही हैं। इनमें 45 बेटियां शामिल हैं, जो नियमित रूप से पढ़ाई कर रही हैं।
सरकारी स्कूल की स्थिति में भी अब सुधार देखने को मिला है। हाल के इंटर परिणाम में इसका असर साफ दिखाई दिया।
इंटर में बेटियों की सफलता
गांव के नारायण सिंह भोक्ता की पुत्री चांदनी कुमारी प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई हैं। इस वर्ष कुल छह लड़कियों ने इंटर परीक्षा पास की है।
यह उपलब्धि पूरे गांव के लिए गर्व का विषय बन गई है। बेटियों की सफलता ने नई उम्मीद जगाई है।
साइकिलों पर सपनों की उड़ान
आज बुमेर टोला अम्बातरी में शिक्षा एक आंदोलन बन चुका है। जहां कभी बेटियों की पढ़ाई पर सवाल उठते थे, वहां अब वे साइकिलों से स्कूल जाती हैं।
यह बदलाव समाज में नई दिशा का संकेत दे रहा है। साबित हो रहा है कि एक महिला की पहल पूरे समाज को बदल सकती है।