दिग्विजय सिंह की 16वीं पुण्यतिथि: खुशी होती अगर मंजिल तक पहुंचा दिया होता... आज भी गूंजता है जमुई का दर्द
दिवंगत दिग्विजय सिंह की 16वीं पुण्यतिथि पर जमुई और बिहार उन्हें आज भी याद कर रहे हैं। उनकी असामयिक मृत्यु से जमुई के विकास की कई योजनाएं अधूरी रह गईं, ...और पढ़ें

दिग्विजय सिंह की 16वीं पुण्यतिथि

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
आशुतोष सिंह, जमुई। डेढ़ दशक से अधिक समय गुजर गया, लेकिन दादा की कमी आज भी जमुई और बांका सहित पूरे बिहार को खल रही है। 16 साल बीत गए पर दिवंगत दिग्विजय सिंह की यादें आज भी लोगों के दिलों में ताजा हैं।
‘मृत्यु वैसे भी दुखदायी होती है, परंतु अल्पायु में मृत्यु अधिक दुखदायी और असहनीय होती है’ भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने उनके निधन पर 16 वर्ष पूर्व कही थी।
दिग्विजय सिंह के बारे में जानिए-
दिग्विजय सिंह का जन्म 14 नवंबर 1955 को जमुई जिले के गिद्धौर में हुआ था। वे माता-पिता के इकलौते बेटे थे। पटना विश्वविद्यालय से एमए और दिल्ली से एमफिल करने के बाद उन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया।
सत्ता में रहे या न रहे, उनका कद इतना ऊंचा था कि लोग आज भी उनकी यादों को विकास, माननता, खेल और भारतीय संस्कृति से जोड़कर देखते हैं।
25 अगस्त 1994 को राज्यसभा में रेल बजट पर बोलते हुए उन्होंने बक्सर में भाग लेते हुए जमुई, झाझा, जमालपुर, टुंका और हावड़ागंज जैसे पिछड़े इलाकों में रेल सुविधा की मांग उठाई थी।
असामयिक मौत ने सब कुछ बदल दिया...
उनकी पहल पर जमुई में रेलवे रेस्ट हाउस, झाझा में लोको शेड, जमालपुर कारखाने का जीर्णोद्धार और जमुई जिले में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना जैसी कई योजनाएं आगे बढ़ीं, लेकिन असामयिक मौत ने सब कुछ बदल दिया।
योजनाओं की फाइलों पर धूल जम गई और समर्थकों के दिल में एक ही टीस रह गई, ‘बड़ी मुश्किल से जिस कश्ती को तुम इस ओर लाए थे, खुशी होती अगर मंजिल तक भी पहुंचा दिया होता..!’
आज 16वीं पुण्यतिथि पर भी लोग यही कहते हैं कि अगर दादा होते तो जमुई की तस्वीर कुछ और होती। उनकी सादगी, विकास की सोच और जनता से जुड़ाव आज भी यादों के झरोखे में जीवित है।
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