पूस की ठंड में पीठा: बिहार की पारंपरिक स्वाद और सेहत का खजाना, कैसे बनाएं, यह भी जान लें
पूस माह में ग्रामीण क्षेत्रों में पीठा बनाने की परंपरा आज भी जीवित है। यह स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजन ठंड से बचाव के लिए पारंपरिक उपाय है। चावल के आटे ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर
HighLights
पीठा पूस माह में ठंड से बचाव का पारंपरिक व्यंजन।
चावल के आटे से बना, गुड़-तीसी भरावन से पौष्टिक।
ग्रामीण संस्कृति, आत्मनिर्भरता और पारंपरिक ज्ञान का प्रतीक।
संवाद सूत्र, अलीगंज (जमुई)। पूस का महीना आते ही ग्रामीण अंचलों में ठंड से बचाव के लिए प्राकृतिक और पारंपरिक उपाय के रूप में पीठा बनाने की परंपरा आज भी जीवित है। पीठा, जिसे क्षेत्र विशेष में फरा, बगिया और गोझा भी कहा जाता है, न सिर्फ स्वाद में लाजवाब होता है, बल्कि पौष्टिकता से भरपूर भी होता है।
ठंड में लाभकारी
ठंड के मौसम में शरीर को गर्माहट देने वाला यह व्यंजन कभी हर घर की जरूरत हुआ करता था। धान की कटनी के साथ ही सर्दी का आगमन होता था। उस समय भले ही पैसों की कमी रहती थी, लेकिन चावल, गुड़ और तीसी जैसे अनाज हर घर में उपलब्ध होते थे। चावल के आटे से बने पीठा में गुड़-तीसी, आलू, दाल, खोआ और कभी-कभी बादाम तक का इस्तेमाल किया जाता था। खासकर पूस माह में कई परिवारों के लिए पीठा ही एक समय का मुख्य भोजन हुआ करता था।
ऐसे बनता है पारंपरिक पीठा
- पानी उबालकर उसमें चावल का आटा डालकर गूंथा जाता है
- आटे की छोटी-छोटी लोइयां बनाई जाती हैं
- गुड़ में तीसी का चूरा मिलाया जाता है
- लोइयों में भरावन डालकर गोल या लंबा आकार दिया जाता है
- उबलते पानी में डालकर पीठा पकाया जाता है
सांस्कृतिक व्यंजन
डा. राकेश रंजन कहते हैं कि मुझे पीठा खाना बेहद पसंद है। यह स्वादिष्ट होने के साथ सुपाच्य भी होता है। ठंड के मौसम में पीठा खाने का मजा ही अलग होता है। इसे एक सांस्कृतिक व्यंजन दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। वहीं, ग्रामीणों का कहना है कि पहले न तो पर्याप्त कपड़े होते थे और न ही ठंड से बचाव के आधुनिक साधन। ऐसे में दूध और पीठा ही शरीर को गर्म रखने का सहारा था।
ग्रामीणों को विशेष पसंद
खासकर ग्रामीण इलाकों में सदियों से पूस माह शुरू होते ही हर घर में पीठा पकना शुरू हो जाता था। आज भी पीठा केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति, आत्मनिर्भरता और पारंपरिक ज्ञान का प्रतीक बना हुआ है। ठंड की दस्तक के साथ ही इसकी खुशबू एक बार फिर लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ देती है।