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    रेतीली जमीन के रसदार फलों पर मौसम की मार, कटिहार के किसान परेशान; 500 एकड़ में होती है तरबूज-खरबूज की खेती

    Updated: Mon, 06 Apr 2026 01:27 PM (IST)

    कटिहार के गंगा दियारा क्षेत्र में तरबूज और खरबूज की खेती पर मौसम की मार पड़ी है। दिसंबर तक ठंड रहने से बुआई में देरी हुई, जिससे उत्पादन और लागत दोनों ...और पढ़ें

    रेतीली जमीन के रसदार फलों पर मौसम की मार, कटिहार के किसान परेशान

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    भूपेंद्र सिंह, बरारी (कटिहार)। गंगा दियारा की रेतीली भूमि पर उगने वाले रसदार फलों पर इस बार मौसम की मार साफ नजर आ रही है। पिछले वर्ष दिसंबर माह तक ठंड का असर बने रहने के कारण इस बार दियारा क्षेत्र में तरबूज और खरबूज की बुआई देर से हुई। इसका सीधा असर उत्पादन और लागत दोनों पर पड़ता दिख रहा है, जिससे किसान हताश हैं।

    बरारी, कुर्सेला और इसके सीमावर्ती मनिहारी के गंगा दियारा क्षेत्र में करीब 500 एकड़ में तरबूज और खरबूज की खेती की जाती है। यहां के किसान महंगे बीज और खाद का उपयोग कर बेहतर उत्पादन की उम्मीद रखते हैं, लेकिन इस बार उनकी उम्मीदों पर मौसम ने पानी फेर दिया है।

    ठंड के कारण बुआई में देरी बनी मुख्य वजह

    दियारा क्षेत्र की उपजाऊ रेतीली मिट्टी रसदार फलों के लिए अनुकूल मानी जाती है। सामान्यतः किसान नवंबर से दिसंबर के बीच तरबूज-खरबूज की बुआई कर देते हैं और अप्रैल तक फल पककर तैयार हो जाते हैं, लेकिन इस बार दिसंबर के अंत तक चली शीतलहर और भीषण ठंड के कारण बुआई जनवरी-फरवरी के बीच करनी पड़ी। इससे पौधे पिछड़ गई है, जिसका असर उत्पादन के साथ-साथ बाजार भाव पर भी पड़ने की संभावना है।

    देश-विदेश तक पहुंचती है दियारा की मिठास

    गंगा दियारा के तरबूज और खरबूज अपनी मिठास के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। फल तैयार होते ही विभिन्न मंडियों के व्यापारी यहां पहुंचने लगते हैं। किसानों के अनुसार यहां के फल नेपाल, पश्चिम बंगाल, टाटा, झरिया सहित बिहार के मुजफ्फरपुर, भागलपुर, समस्तीपुर, देवघर लखीसराय आदि बड़े बाजारों तक भेजे जाते हैं।

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    गंगा पार खेतों से बाजार तक पहुंचाना बड़ी चुनौती

    किसानों का कहना है कि इस खेती में काफी मेहनत लगती है। गंगा पार खेतों से फल को बाजार तक पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण और खर्चीला होता है।

    व्यवसायी विनोद चौधरी, किसान श्रीराम चौधरी, रामनाथ चौधरी आदि बताते हैं कि तरबूज-खरबूज की बीज 35 हजार रुपये प्रति किलो से शुरू होकर उन्नत किस्मों के लिए 55 हजार रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। बेहतर उत्पादन के लिए अधिकतर किसान महंगे बीजों का ही इस्तेमाल करते हैं। एक एकड़ में करीब 50 हजार रुपये तक लागत आती है। इसके अलावा नाव और ट्रैक्टर के जरिए गंगा पार से बाजार तक फल पहुंचाने में भी काफी खर्च होता है।

    किसानों का कहना है कि यदि बाजार भाव 10 रुपये प्रति किलो से कम रहता है, तो इतनी मेहनत के बावजूद यह खेती घाटे का सौदा बन जाती है। किसानों ने बताया कि इस खेती पर सरकार की ओर से कोई विशेष अनुदान भी नहीं मिलता है।

    क्या कहते हैं कृषि विज्ञानी?

    कृषि विज्ञानी अमर प्रकाश मिश्रा ने बताया कि ठंड का असर देर तक रहने के कारण इस बार बुआई में देरी हुई है, जिससे उत्पादकता प्रभावित होने की आशंका है।