मुंगेर: 200 मीटर का सहारा भी डूबा, अब नाव के भरोसे हजारों जिंदगी; खतरे के साथ मानसी-खगड़िया का सफर
बूढ़ी गंडक में जलस्तर बढ़ने से मुंगेर के टीकारामपुर दियारा का 200 मीटर लंबा चचरी पुल डूब गया है, जिससे हजारों ग्रामीणों का सड़क संपर्क टूट गया है। ...और पढ़ें

गंडक के पानी में डूबा चचरी पुल। सौजन्य- ग्रामीण
HighLights
बूढ़ी गंडक में जलस्तर बढ़ने से चचरी पुल डूबा।
टीकारामपुर दियारा के हजारों लोगों का संपर्क टूटा।
आठ साल से स्थायी पुल का निर्माण अधूरा।
संवाद सहयोगी, मुंगेर। बूढ़ी गंडक के बढ़े जलस्तर ने टीकारामपुर दियारा के हजारों लोगों का एकमात्र सहारा भी छीन लिया। गंगापार टीकारामपुर को खगड़िया के मानसी और मटिहानी से जोड़ने वाला करीब 200 मीटर लंबा बांस का चचरी पुल सोमवार को बाढ़ के पानी में पूरी तरह डूब गया।
वहीं, मानसी की ओर पुल का एक हिस्सा ध्वस्त हो गया। इसके साथ ही हजारों ग्रामीणों का सड़क संपर्क टूट गया और अब उन्हें जान जोखिम में डालकर नाव से नदी पार करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
टीकारामपुर पंचायत के लोगों के लिए यह चचरी पुल सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि शिक्षा, इलाज, बाजार और जिला मुख्यालय तक पहुंचने की जीवनरेखा था। अब पुल डूबने के बाद ग्रामीण पहले नाव से बूढ़ी गंडक पार करेंगे, फिर मानसी या मटिहानी पहुंचकर मुंगेर और खगड़िया का सफर तय करेंगे।
हर सफर अब खतरे के साथ
ग्रामीण जयशंकर राय, राजीव कुमार, सुजीत कुमार यादव, समाजसेवी मोनू कुमार और वार्ड प्रतिनिधि विकास कुमार ने बताया कि पुल डूबने के बाद पंचायत के हजारों लोग नाव के भरोसे रह गए हैं। बाढ़ के बीच रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी नदी पार करना पड़ रहा है। सबसे अधिक परेशानी मरीजों, महिलाओं, बच्चों और छात्रों को हो रही है।
ग्रामीण बताते हैं कि हर वर्ष छठ पर्व के बाद गांव के लोग आपस में चंदा जुटाकर बांस का चचरी पुल बनाते हैं। करीब पांच लाख रुपये की लागत से तैयार होने वाला यह पुल पूरे वर्ष आवागमन का सहारा बनता है, लेकिन जुलाई में बूढ़ी गंडक में बाढ़ आते ही पुल पानी में समा जाता है और लोगों की जिंदगी फिर नाव के भरोसे आ जाती है।
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आठ वर्ष में भी नहीं बन सका पक्का पुल
सवाल यह है कि जब स्थायी पुल का निर्माण वर्षों पहले शुरू हो चुका है, तब भी लोगों को हर साल यह संकट क्यों झेलना पड़ रहा है। वर्ष 2017 में ग्रामीण कार्य विभाग, खगड़िया ने बूढ़ी गंडक पर पक्का पुल बनाने का काम शुरू कराया था।
आठ वर्ष बीत गए, दो संवेदक बदल गए और अब तीसरी एजेंसी यदुवंशम कंस्ट्रक्शन कंपनी को काम सौंपा गया है। इसके बावजूद पुल आज भी अधूरा है।
निर्माणाधीन पुल के आठ पिलरों में छह का निर्माण कर उन पर स्लैब डाल दिया गया है, लेकिन नदी के बीच के दो महत्वपूर्ण पिलर अब तक नहीं बन सके हैं। यही वजह है कि पुल आज तक तैयार नहीं हो पाया।
हर बाढ़ में टूटते हैं सपने
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल बाढ़ के समय प्रशासन और विभाग के दावे बह जाते हैं, लेकिन उनकी परेशानी जस की तस बनी रहती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि समय पर पक्का पुल बन गया होता तो आज हजारों लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर नाव से सफर करने की मजबूरी नहीं होती। अब लोगों ने सरकार और विभाग से अधूरे पुल का निर्माण शीघ्र पूरा कराने की मांग तेज कर दी है।