बिहार का इंजीनियर मक्के के छिलके से प्लास्टिक को दे रहा मात, रेलवे से मिला ₹30 लाख का ऑर्डर
Corn Husk Plastic Alternative: मुजफ्फरपुर के इंजीनियर नाज ओजैर ने मक्के के छिलकों से बायोडिग्रेडेबल उत्पाद बनाकर सिंगल यूज प्लास्टिक का विकल्प पेश किय ...और पढ़ें
HighLights
नाज ओजैर ने मक्के के छिलके से बायोडिग्रेडेबल उत्पाद बनाए।
उन्हें सरकारी पेटेंट मिला, रेलवे से 30 लाख का ऑर्डर।
बच्चों को तकनीक सिखाकर प्लास्टिक के प्रति जागरूक कर रहे।
प्रमोद कुमार, मुजफ्फरपुर। Muzaffarpur Engineer Naz Ozair: बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक युवा इंजीनियर ने पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी तकनीक की दिशा में एक अनोखी मिसाल पेश की है।
मनियारी क्षेत्र के मुरादपुर गांव निवासी मोहम्मद नाज ओजैर ने मक्के के छिलकों (कॉर्न हस्क) से ऐसे बायोडिग्रेडेबल उत्पाद तैयार किए हैं जो सिंगल यूज प्लास्टिक को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
वैश्विक सोच और संकल्प
हैदराबाद की जवाहर लाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से एमटेक करने वाले नाज ओजैर के पास कई बड़ी कंपनियों के ऑफर थे, लेकिन उन्होंने सुनहरे करियर को ठुकरा कर प्रकृति से प्रेम और कुछ अलग करने का संकल्प चुना। उन्होंने करीब 5 साल तक लगातार कठिन शोध और प्रयोग कर यह मुकाम हासिल किया।
भतीजे के दर्द से मिली सीख
नाज ने बताया कि सात साल पहले उनके एक कम उम्र के भतीजे की कैंसर से मौत हो गई थी। इस पारिवारिक हादसे ने उन्हें खाद्य पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले खतरनाक प्लास्टिक के दुष्प्रभावों पर सोचने के लिए मजबूर किया और वे नौकरी छोड़ विकल्प की खोज में जुट गए।
बेकार अवशेष से कमाल
मक्के की फसल से दाना निकलने के बाद किसान अमूमन इसके छिलके को बेकार समझकर फेंक देते हैं या खेतों में जला देते हैं। नाज ने इसी कृषि अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन बना दिया और इसके जरिए चॉकलेट रैपर, डिस्पोजेबल कप, प्लेट, कटोरी, बैनर और कैरी बैग तैयार कर लिए।
लागत और निर्माण प्रक्रिया
नाज मक्के के छिलके को ऊपर और नीचे से काट कर चौकोर आकार देते हैं। एक प्लेट बनाने में पांच से छह पत्ते लगते हैं, जिन्हें प्राकृतिक लेई से चिपकाकर डाई मशीन से काटा जाता है। एक पत्तल बनाने में महज 50 पैसे का खर्च आता है और वाटरप्रूफ होने के कारण यह पूरी तरह सुरक्षित है।
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रेलवे से बड़ा ऑर्डर
नाज के इस बेहतरीन नवाचार को फरवरी 2024 में सरकारी पेटेंट भी मिल चुका है। उनके इस अनूठे स्टार्टअप की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय रेलवे की ओर से उन्हें 30 लाख रुपये का एक बड़ा ऑर्डर मिला है।
तकनीक सिखा रहे नाज
नाज सिर्फ खुद ही उत्पाद नहीं बना रहे, बल्कि वे दो दर्जन से अधिक स्कूलों में जाकर 1000 से ज्यादा बच्चों को मक्के के छिलके से तिरंगा और अन्य उत्पाद बनाने की तकनीक सिखा चुके हैं। इसके जरिए वे नई पीढ़ी को प्लास्टिक के नुकसान के प्रति जागरूक कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने भी सराहा
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के सीनियर मक्का वैज्ञानिक डॉ. मृत्युंजय का भी मानना है कि मक्के का छिलका प्लास्टिक का सबसे सस्ता और बेहतर विकल्प है। नाज की इस पहल से अब बिहार के किसानों को भी मक्के के बेकार छिलकों का अच्छा आर्थिक मूल्य मिलने लगा है।