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    मुजफ्फरपुर में अनोखा मामला : 150 रुपये का विवाद, 45 साल तक चली कोर्ट की जंग... बुढ़ापे में मिली रिहाई

    Updated: Sat, 11 Jul 2026 08:00 AM (IST)

    मुजफ्फरपुर में 150 रुपये के उधार को लेकर 45 साल पुराना एक अनोखा मामला सामने आया है। दोषी पाए गए 75 वर्षीय भिखारी सहनी को लंबी मुकदमेबाजी और वृद्धावस्थ ...और पढ़ें

    इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

    इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

    HighLights

    1. 150 रुपये के उधार पर 45 साल चला मुकदमा।

    2. 75 वर्षीय दोषी भिखारी सहनी को वृद्धावस्था में रिहाई मिली।

    3. मारपीट और आगजनी का दोषी, परिवीक्षा अधिनियम के तहत छोड़ा।

    जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर । महज डेढ़ सौ रुपये उधार का विवाद, कोर्ट में करीब 45 साल केस और अंत में दोषी पाए जाने के बाद वृद्धावस्था के कारण रिहाई।

    चार दशक से अधिक समय से चले रहे केस में जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-20 के न्यायाधीश शरद चंद्र कुमार ने एकमात्र जीवित बचे आरोपित भिखारी सहनी (75) को बरी कर दिया है।

    हालांकि, कोर्ट ने उसे सूचिका और उसके बेटे के साथ मारपीट करने व बंधक बनाने का दोषी पाया। मामले की अत्यधिक लंबी अवधि और आरोपित की वृद्ध अवस्था को देखते हुए अदालत ने उसे जेल भेजने के बजाय आपराधिक परिवीक्षा अधिनियम के तहत चेतावनी देकर रिहा करने का आदेश दिया।

    यह पूरा विवाद महज 150 रुपये के एक पुराने उधार (पैंचा) को लेकर शुरू हुआ था। घटना पांच मई 1981 की रात करीब 11 बजे की थी।

    गायघाट थाना के एक गांव में कबूतरी मलाहिन घर में सोई हुई थी। उसी दिन दोपहर में उसका बेटा लोढ़न सहनी गांव के ही भिखारी सहनी से अपने उधार दिए पैसे मांगने गया था।

    इसी बात की रंजिश को लेकर उसी रात जयश्री सहनी, भिखारी सहनी, महेंद्र सहनी, परमेश्वर सहनी, नरेश सहनी, कप्पल सहनी, देवनारायण सहनी समेत अन्य ने लाठी-डंडों के साथ सूचिका के दरवाजे पर आ धमके।

    गाली-गलौच का विरोध पर जयश्री, भिखारी और नरेश सहनी ने उसे लात-मुक्कों और थप्पड़ों से मारा। चीख-पुकार सुनकर जब उसका बेटा लोढ़न सहनी बीच बचाव करने दौड़ा तो आरोपित भिखारी सहनी और महेंद्र सहनी ने उसके हाथ-पैर रस्सी से बांध दिए।

    इसके बाद अभियुक्तों ने सूचिका के आंगन में घुसकर जयश्री सहनी के आदेश पर नरेश सहनी द्वारा माचिस की तीली से घर में आग लगा दी थी। आगजनी में घर का चौखट, किवाड़, दो मन धान, एक मन गेहूं, खैनी और कपड़े समेत 25 सौ रुपये का सामान जल गया था।

    43 साल तक चला कानूनी सफर 

    पांच मई 1981 को पीड़िता ने गायघाट थाने में प्राथमिकी कराई थी। 14 जून 1981 को पुलिस ने आरोपितों के विरूद्ध आरोप पत्र दाखिल किया। 17 जनवरी 1983 को आरोपितों के खिलाफ अदालत में आरोप तय किए गए।

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    2024 में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के आदेश पर इस मामले को त्वरित निष्पादन के लिए अपर सत्र न्यायाधीश-20 की अदालत में स्थानांतरित किया गया।

    चार दशक से भी लंबे चले मुकदमे के दौरान कई मोड़ आए। सात अभियोजन साक्षियों को न्यायालय में पेश किया गया। इनमें से सूचिका और उसके बेटे ने मारपीट और बंधक बनाए जाने की पुष्टि की। वहीं, स्वतंत्र गवाहों में से दो गवाह अदालत में अपने पुराने बयानों से मुकर गए। इसके बाद कोर्ट ने उन्हें पक्षद्रोही घोषित कर दिया।

    बुढ़ापे और लंबी मुकदमेबाजी को देख कोर्ट ने दिखाई नरमी

    दंड के प्रश्न पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि दोषी भिखारी सहनी गरीब और वृद्ध व्यक्ति है। पिछले 43 वर्षों से इस मुकदमे की लंबी प्रक्रिया को झेल रहा है और उसका कोई पुराना आपराधिक रिकार्ड नहीं है।

    दूसरी ओर मुख्य अभियोजक मनोज कुमार ने अधिकतम सजा की मांग की। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने भिखारी सहनी को अपराधिक परिवीक्षा अधिनियम का लाभ दिया।

    न्यायालय ने उसे बिना किसी जेल की सजा के इस सख्त चेतावनी और भर्त्सना (फटकार) के साथ रिहा कर दिया कि वह भविष्य में किसी भी प्रकार की आपराधिक या गैर-कानूनी गतिविधि में संलिप्त नहीं होगा।

    इस मामले के एक अन्य आरोपित कप्पल सहनी की विचारण के दौरान ही मृत्यु हो चुकी थी। ग्राम कचहरी के सरपंच के मृत्यु प्रमाण पत्र के आधार पर उसके खिलाफ कार्यवाही पहले ही समाप्त कर दी गई थी।

    केस में लाखों हो गए खर्च 

    महज डेढ़ सौ के विवाद में केस लड़ने में लाखों रुपये खर्च हो गए। उपलब्ध रिकार्ड के अनुसार वर्ष 2018 से ही आठ वर्षों में 130 तारीख हुई।

    इस औसत से लगभग सात सौ तारीख होने का अनुमान है। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे केस अवधि में पांच से छह लाख रुपये खर्च हो गए होंगे। वह भी महज डेढ़ सौ के विवाद में।