दुर्गा सप्तशती पाठ से माहौल भक्तिमय, मुजफ्फरपुर में 501 कन्याओं ने निकाली भव्य कलश यात्रा
चैती दुर्गा पूजा समिति ने 501 कन्याओं, महिलाओं और पुरुषों के साथ भव्य कलश शोभा यात्रा निकाली। यह यात्रा पूजा स्थल से शुरू होकर नदी तक गई, जहाँ पवित्र ...और पढ़ें

देवी स्थान पर पूजा अर्चना करते श्रद्धालु। जागरण

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संवाद सहयोगी, मुरौल (मुजफ्फरपुर)। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर प्रखंड के बलवा चौक में धार्मिक माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया है। चैती दुर्गा पूजा समिति बलवा के तत्वावधान में गुरुवार को भव्य कलश शोभा यात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
इस दौरान बलवा सहित आसपास के गांवों की 501 कुंवारी कन्याओं, महिलाओं और पुरुषों ने बैंड-बाजे के साथ जय माता दी के जयकारों के बीच कलश यात्रा में हिस्सा लिया। यह शोभा यात्रा पूजा स्थल से शुरू होकर बलवा, बैरवा, साहरघाट, नेताजी चौक और दुर्गा मंदिर समेत कई गांवों के प्रमुख मार्गों से गुजरती हुई साहरघाट स्थित धौंस नदी पहुंची।
यहां श्रद्धालुओं ने पवित्र जल भरकर कलश में स्थापित किया और पुनः पूजा स्थल पर लौटे। पूजा स्थल पर आचार्य पंडितों द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर कलश स्थापना की गई, जिसके साथ ही नौ दिवसीय नवरात्र की शुरुआत हो गई।पूजा पंडाल में चल रहे दुर्गा सप्तशती के पाठ से बलवा गांव सहित आसपास के इलाकों का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में पूजा-अर्चना में शामिल हो रहे हैं।
नवरात्र का पहला दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। ‘शैल’ यानी पर्वत और ‘पुत्री’ यानी बेटी। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है।
ज्योतिषाचार्य पं अभिषेक चतुर्वेदी ने बताया कि यह स्वरूप प्रकृति, स्थिरता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। वृषभ (बैल) पर सवार मां शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित होता है, जो शक्ति और शांति का अद्भुत संगम दर्शाता है।
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विस्तृत पूजा विधि
कलश स्थापना के लिए गणेश जी का स्वरूप मानकर सबसे पहले उनकी पूजा की जाती है। उसके बाद मां शैलपुत्री का आह्वान किया जाता है।
- शुद्धिकरण: स्नान के बाद पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।
- आसन: मां की प्रतिमा या तस्वीर को चौकी पर स्थापित करें।
- संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें।
- षोडशोपचार पूजन: धूप, दीप, गंध, पुष्प और नैवेद्य से मां की आरती करें।
- पुष्प: मां को सफेद रंग के फूल (जैसे चमेली या सफेद कनेर) अति प्रिय हैं।
- भोग: मां शैलपुत्री को गाय का शुद्ध घी या सफेद रंग की मिठाइयां (मिश्री-मावा) अर्पित करें।
- मंत्र जाप: इस मंत्र का 108 बार जाप करें:
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
- आरती: अंत में मां शैलपुत्री की आरती गाएं और कपूर से कपूर गौरं करें।
त्याग, तपस्या और पुनर्जन्म की प्रेरणा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, मां शैलपुत्री पूर्व जन्म में सती थीं, जो राजा दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी थीं। एक यज्ञ में शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण सती ने अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया।
अगले जन्म में उन्होंने हिमालय के घर शैलपुत्री के रूप में जन्म लिया और कठोर तपस्या कर पुनः शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। यह कथा त्याग, आत्मसम्मान और अटूट संकल्प की प्रेरणा देती है।
जीवन में स्थिरता और संतुलन का आधार
मां शैलपुत्री की आराधना केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। योग साधना में इनका संबंध मूलाधार चक्र से है, जो जीवन की ऊर्जा का आधार माना जाता है।
इनकी पूजा से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता आती है, मन दृढ़ होता है और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है। ज्योतिष के अनुसार, मां शैलपुत्री की आराधना से चंद्रमा के अशुभ प्रभाव भी शांत होते हैं।
चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर संकल्प मजबूत हो तो लक्ष्य जरूर हासिल किया जा सकता है। मां शैलपुत्री की पूजा इसी अडिग विश्वास और आंतरिक शक्ति को जागृत करने का माध्यम है।
