ASI के नियमों में फंसा 1300 करोड़ का राजगीर एलिवेटेड कॉरिडोर प्रोजेक्ट, जाम से नहीं मिली राहत
राजगीर में 1300 करोड़ रुपये का एलिवेटेड कॉरिडोर प्रोजेक्ट भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नियमों के कारण अधर में लटक गया है। ...और पढ़ें

राजगीर एलिवेटेड कॉरिडोर प्रोजेक्ट
HighLights
राजगीर एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना ASI नियमों से रुकी।
1300 करोड़ का प्रोजेक्ट संरक्षित स्मारकों के कारण अटका।
राजगीर को जाम से स्थायी राहत नहीं मिल पा रही।
संवाद सहयोगी, राजगीर। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन नगरी राजगीर को जाम की समस्या से स्थायी राहत दिलाने वाली फोर लेन एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना फिलहाल अधर में लटकी हुई है। यदि यह परियोजना समय पर धरातल पर उतर जाती, तो मेले और पर्यटन सीजन के दौरान शहर को बार-बार जाम की समस्या से नहीं जूझना पड़ता।
वर्तमान में निर्धारित रूट चार्ट के तहत वाहनों का आवागमन शहर के भीतरी मार्गों से होने के कारण लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
जानकारों का मानना है कि एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण हो जाने पर राजगीर को जाम की समस्या से काफी हद तक मुक्ति मिल सकती थी। हालांकि विभिन्न विभागों से आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) नहीं मिलने के कारण यह महत्वाकांक्षी परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
डीपीआर और फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार
सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-82) प्राधिकरण ने परियोजना से संबंधित आवश्यक कागजी प्रक्रिया पूरी कर डीपीआर और फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार कर भेज दी थी। लेकिन निर्माण क्षेत्र से जुड़े अन्य विभागों, विशेषकर पुरातत्व विभाग की स्वीकृति नहीं मिलने से मामला अटक गया।
बताया जाता है कि वनगंगा पुल के समीप उदयगिरि और सोनागिरि पहाड़ियों के बीच स्थित साइक्लोपियन वॉल तथा हाल में उत्खनित स्तूप पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारकों की श्रेणी में आते हैं। प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर के तहत इसी क्षेत्र में केबल-स्टेड ब्रिज का निर्माण होना था।
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संरक्षित स्मारकों के 100 मीटर दायरे में निर्माण प्रतिबंधित
पुरातात्विक नियमों के अनुसार संरक्षित स्मारकों के 100 मीटर दायरे में किसी भी प्रकार का निर्माण प्रतिबंधित है। इसी कारण परियोजना को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रही और योजना ठंडे बस्ते में चली गई। करीब 8.7 किलोमीटर लंबे इस एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण पर लगभग 1300 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान था।
परियोजना को स्वीकृति मिलने के बाद कार्यारंभ की प्रक्रिया तेज हुई थी और इसके लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) भी तैयार किया गया था।
परियोजना को 30 महीने में पूरा करने का लक्ष्य
गौरतलब है कि 26 मार्च 2021 को नेचर सफारी के उद्घाटन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस परियोजना को गया-राजगीर-बिहारशरीफ राजमार्ग का अहम हिस्सा बताते हुए फिजिबिलिटी रिपोर्ट और डीपीआर शीघ्र तैयार करने का निर्देश दिया था।
18 एकड़ भूमि पर प्रस्तावित इस परियोजना को 30 महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। योजना में कई पर्यटन स्थलों का विकास, दोनों ओर फुटपाथ निर्माण तथा रोपवे मोड़ के पास वाहनों की सुगम आवाजाही के लिए रैंप निर्माण का भी प्रावधान था।
परियोजना पर अनिश्चितता के बादल छाने से स्थानीय लोगों में निराशा है। उनका मानना है कि यदि संबंधित विभागों के बीच समन्वय स्थापित हो जाए तो राजगीर के विकास की दिशा में यह परियोजना एक नई मिसाल बन सकती है।
एलिवेटेड कॉरिडोर को लेकर स्थानीय लोगों में काफी उत्साह था। इसके ठंडे बस्ते में चले जाने से राजगीर के विकास को बड़ा झटका लगा है।- महेंद्र प्रसाद गुप्ता, समाजसेवी
मेले और पर्यटन सीजन में शहर को हर वर्ष जाम की समस्या से जूझना पड़ता है। एलिवेटेड कॉरिडोर इसका स्थायी समाधान साबित हो सकता था।- मनीष उपाध्याय, नागरिक
केंद्र और राज्य सरकार यदि एनएमए, एएसआई, एसीवाईडी और एनएच विभाग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करे तो यह परियोजना फिर से गति पकड़ सकती है।- रंजीत कुमार उर्फ टून्ना, समाजवादी चिंतक
यह परियोजना राजगीर की जनता और पर्यटकों के लिए एक बड़ी सौगात साबित होती। इसे पुनर्जीवित करने की दिशा में गंभीर पहल होनी चाहिए।- डॉ. अनिल कुमार, वार्ड पार्षद