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    बांकीपुर ने बजाई खतरे की घंटी! BJP-RJD को झटका; PK तीसरा विकल्प, अब 2 बातों पर करना पड़ेगा फोकस

    Updated: Mon, 03 Aug 2026 07:35 PM (IST)

    बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की जीत ने भाजपा और राजद दोनों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। ...और पढ़ें

    जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर।

    जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर।

    HighLights

    1. बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जन सुराज की जीत।

    2. भाजपा और राजद के लिए खतरे की घंटी, रणनीति बदलने की जरूरत।

    3. मतदाता अब पारंपरिक विकल्पों से हटकर तीसरा विकल्प चाहते हैं।

    अरुण अशेष, पटना। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का परिणाम पारंपरिक राजनीतिक दलों के लिए झटका भी है और आत्ममंथन का अवसर भी। बीते 21 वर्षों से राज्य की राजनीति में एनडीए सत्ता पक्ष और राजद नेतृत्व वाला गठबंधन विपक्ष में रहा है।

    ऐसे में बांकीपुर की जनता ने तीसरे विकल्प को चुनकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। पहली बार चुनाव जीते जन सुराज के प्रशांत किशोर के पक्ष में हुई गोलबंदी ने पुराने राजनीतिक समीकरणों पर सवाल खड़े किए हैं।

    राजद के MY समीकरण को भी चुनौती

    प्रशांत किशोर के पक्ष में हुई गोलबंदी का एक संदेश यह भी है कि राजद का पारंपरिक MY समीकरण हर स्थिति में एकजुट नहीं रह रहा।

    दूसरी ओर एनडीए और खासकर भाजपा के लिए शहरी मतदाताओं के बदलते रुख को समझना चुनौती है।

    हालांकि यह उपचुनाव है, इसलिए इसके परिणाम को अगले विधानसभा चुनाव का सीधा संकेत मानना उचित नहीं होगा।

    भाजपा के सामने उम्मीदवार और संगठन की चुनौती

    भाजपा और राजद के बीच एक समानता रही है कि दोनों कई बार अपने पारंपरिक समर्थकों को स्थायी मानकर चलते हैं।

    बांकीपुर में उम्मीदवार बदलने के फैसले ने भी चर्चा पैदा की। चुनाव के दौरान पार्टी के भीतर टिकट की उम्मीद रखने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका कितनी प्रभावी रही, इसका आकलन आने वाले समय में किया जाएगा।

    पहली बार भाजपा की अगुआई वाली सरकार में झटका

    सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्रित्व में यह पहला उपचुनाव था। ऐसे में बांकीपुर का परिणाम भाजपा और सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

    पार्टी के अंदर इस बात पर भी मंथन होगा कि संगठन और नेतृत्व की रणनीति में कहां कमी रह गई। खासकर मजबूत माने जाने वाले क्षेत्र में हार के कारणों की समीक्षा स्वाभाविक है।

    NDA की एकजुटता पर भी सवाल

    उपचुनाव के शुरुआती दौर में एनडीए के सभी सहयोगी दल समान रूप से सक्रिय नहीं दिखे। बाद में जरूरत के अनुसार जदयू समेत अन्य दलों की सक्रियता बढ़ी, लेकिन जदयू समर्थकों के एक हिस्से तक गठबंधन का संदेश प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पाने की चर्चा रही। इस उदासीनता को भी आने वाले चुनावों के लिए गंभीरता से देखना होगा।

    बांकीपुर में भाजपा का लंबा दबदबा टूटा

    1995 से पूर्ववर्ती पटना पश्चिम और अब बांकीपुर पर भाजपा का प्रभाव रहा है। 1995 से 2006 तक नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा इस सीट से जीतते रहे।

    उनके निधन के बाद 2006 के उपचुनाव से 2025 तक नितिन नवीन लगातार पांच बार विधायक चुने गए। इसी सीट से विधायक रहते उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया।

    नीतीश के साथ के बावजूद मिली हार

    बांकीपुर का यह पहला उपचुनाव रहा, जिसमें नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जदयू का साथ होने के बावजूद भाजपा को हार मिली।

    1995 और 2015 में भाजपा ने अपने दम पर इस सीट पर जीत दर्ज की थी, उस समय नीतीश कुमार भाजपा के साथ नहीं थे। इसलिए मौजूदा परिणाम पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    राजद के हाथ से भी निकला दूसरा स्थान

    बांकीपुर में अब तक हुए चुनावों में राजद या उसके सहयोगी कांग्रेस के उम्मीदवार आम तौर पर दूसरे स्थान पर रहे हैं।

    इस उपचुनाव में राजद यह स्थान भी हासिल नहीं कर सका। पार्टी को मुस्लिम-यादव समीकरण और वैश्य मतदाताओं के एक हिस्से से उम्मीद थी।

    भाजपा की आंतरिक कलह से लाभ मिलने की भी अपेक्षा थी, लेकिन नतीजा इसके विपरीत रहा।

    PK को मिला नए समीकरण का फायदा

    चुनाव प्रचार के महत्वपूर्ण दौर में तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति का असर राजद कार्यकर्ताओं के उत्साह पर पड़ने की चर्चा रही।

    राजद समर्थकों के एक हिस्से में यह सोच बनी कि पहले भाजपा को हराया जाए, आगे की राजनीति बाद में देखी जाएगी।

    इसका लाभ प्रशांत किशोर को मिला। भाजपा के कुछ पारंपरिक मतदाताओं और जदयू समर्थकों ने भी जन सुराज के विकल्प को स्वीकार किया।

    अब प्रशांत किशोर की भी बड़ी जिम्मेदारी

    उपचुनाव में जीत या हार से तत्काल सत्ता का समीकरण आम तौर पर नहीं बदलता, लेकिन प्रशांत किशोर के सामने अब बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी है।

    उनसे विधानसभा में विपक्ष की प्रभावी आवाज बनने की अपेक्षा की जा रही है। सरकार की नीतियों और कमजोरियों पर उनकी पकड़ को देखते हुए उनसे सदन में आक्रामक और तथ्यपूर्ण भूमिका की उम्मीद होगी।

    तीसरे विकल्प को साबित करना होगा

    2025 में गठित बिहार विधानसभा में विपक्षी दल मौजूद हैं, लेकिन संख्या बल कम होने के कारण उनकी भूमिका उतनी प्रभावी नहीं रही है।

    ऐसे में प्रशांत किशोर की जीत ने विपक्षी राजनीति में एक नया चेहरा जरूर दिया है। अब असली चुनौती यह होगी कि जन सुराज बांकीपुर की जीत को व्यापक राजनीतिक विस्तार में बदल पाता है या नहीं।

    वहीं भाजपा और राजद के लिए यह परिणाम अपने-अपने संगठन, वोट बैंक और रणनीति पर गंभीरता से विचार करने का अवसर है।

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