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बिहार में ध्वस्त होते पुल, टूटता भरोसा: आखिर जिम्मेदार कौन?

Published: Fri, 05 Jun 2026 05:06 PM (IST)

Bihar Bridge Collapse: बिहार में पुलों और संपर्क पथों के बार-बार ध्वस्त होने से निर्माण गुणवत्ता व निगरानी पर गंभीर ...और पढ़ें

संपर्क पथ के धंसने से जनता का भरोसा टूट रहा है(AI फोटो)

संपर्क पथ के धंसने से जनता का भरोसा टूट रहा है(AI फोटो)

HighLights

  1. बिहार में पुलों के बार-बार ध्वस्त होने की घटनाएं।

  2. बक्सर में नए रोड ओवरब्रिज संपर्क पथ का धंसना।

  3. निर्माण गुणवत्ता, निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न।

राज्य ब्यूरो, पटना। बिहार ने पिछले दो दशकों में सड़क और पुल निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। गांवों से लेकर शहरों तक संपर्क का दायरा बढ़ा है और आवागमन पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हुआ है।

बड़े-बड़े पुलों और सड़क परियोजनाओं ने विकास की नई संभावनाएं पैदा की हैं। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह पुलों, पुलियों और संपर्क पथों के ध्वस्त होने की घटनाएं सामने आ रही हैं, उन्होंने इस विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था दोनों संदेह के घेरे में हैं।

विकास पर उठते सवाल

बिक्रमशिला सेतु के एक हिस्से के क्षतिग्रस्त होने की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि बक्सर से एक और चिंताजनक खबर सामने आ गई।

रेलवे स्टेशन के पूर्वी हिस्से में निर्मित रोड ओवरब्रिज के संपर्क पथ का एक हिस्सा अचानक धंस गया।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इस संपर्क पथ को महज पंद्रह दिन पहले ही आम यातायात के लिए खोला गया था।

इतनी नई संरचना का इस तरह जवाब दे जाना निर्माण प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्नचिह्न है।

आरोप-प्रत्यारोप का खेल

घटना के बाद राज्य सरकार ने इसकी जिम्मेदारी रेलवे की लापरवाही पर डाल दी। कहा गया कि संपर्क पथ का निर्माण अपेक्षित मानकों के अनुरूप नहीं हुआ था।

दूसरी ओर, ऐसे मामलों में अक्सर विभिन्न एजेंसियां एक-दूसरे पर दोष मढ़ने लगती हैं। लेकिन जनता के लिए यह बहस कोई मायने नहीं रखती।

लोगों के लिए महत्वपूर्ण यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद संरचनाएं सुरक्षित और टिकाऊ क्यों नहीं बन पा रही हैं।

जांच का पुराना रास्ता

ऐसी घटनाओं के बाद जांच समिति गठित करना लगभग एक औपचारिक प्रक्रिया बन चुकी है।

रिपोर्ट आएगी, तकनीकी कारण बताए जाएंगे और कुछ अधिकारियों या कर्मचारियों पर कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे भविष्य में ऐसी घटनाएं रुक जाएंगी?

अनुभव बताता है कि अधिकांश मामलों में जांच की प्रक्रिया लंबी खिंचती है और मूल समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं।

मुनाफे की बढ़ती प्रवृत्ति

निर्माण कार्यों का उद्देश्य जनता को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना होना चाहिए, लेकिन कई मामलों में प्राथमिकता मुनाफा कमाने तक सीमित दिखाई देती है।

लागत घटाने के लिए सामग्री की गुणवत्ता से समझौता किया जाता है।

समय पर काम पूरा दिखाने की होड़ में तकनीकी मानकों की अनदेखी होती है। परिणामस्वरूप परियोजनाएं कागज पर सफल दिखती हैं, लेकिन वास्तविकता में कमजोर साबित होती हैं।

जवाबदेही का अभाव

सबसे गंभीर समस्या जवाबदेही की है। जिन अधिकारियों और एजेंसियों पर गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है, वे भी कई बार अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से नहीं निभाते।

निर्माण, निगरानी और भुगतान की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव दिखाई देता है।

जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी।

समाधान की दिशा

बिहार को केवल अधिक पुल और सड़कें नहीं चाहिए, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ अवसंरचना चाहिए।

इसके लिए निर्माण की प्रत्येक प्रक्रिया में गुणवत्ता नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट, समय-समय पर निरीक्षण और पारदर्शी जवाबदेही व्यवस्था विकसित करनी होगी।

विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब जनता का भरोसा कायम रहे।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है, जब पुल, सड़कें और संपर्क पथ बार-बार ध्वस्त हो रहे हैं, तब आखिर जिम्मेदार कौन है?

जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक विकास की चमक के पीछे छिपी खामियां सामने आती रहेंगी।

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