डीएम की पहल से बिहार में मूक-बधिर बच्चों को मिली नई आवाज, 'श्रवण श्रुति' कार्यक्रम बना वरदान
डीएम डॉ. त्यागराजन एसएम की पहल पर 'श्रवण श्रुति' कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसने मूक-बधिर बच्चों को सुनने-बोलने की क्षमता लौटाई है। यह कार्यक्रम बच्चों की प ...और पढ़ें

डीएम डॉ. त्यागराजन एसएम। (जागरण)
HighLights
डॉ. त्यागराजन की पहल पर 'श्रवण श्रुति' कार्यक्रम शुरू।
मूक-बधिर बच्चों को कॉक्लियर इम्प्लांट व फिजियोथेरेपी।
बिहार में 80 बच्चों को मिली सुनने-बोलने की क्षमता।
पवन कुमार मिश्र, पटना। जो बच्चे अब तक सिर्फ इशारों में अपनी बात कहते थे, जिनके घरों में सालों से खामोशी पसरी थी, आज वहीं शब्द, स्वर व मुस्कान लौट रही है। यह बदलाव किसी चमत्कार से नहीं बल्कि एक संवेदनशील प्रशासनिक सोच का नतीजा है।
गया में एक गरीब पिता की पीड़ा सुन वहां के तत्कालीन डीएम डॉ. त्यागराजन एसएम ने तमाम केंद्रीय व राज्यस्तरीय योजनाओं की पड़ताल कर श्रवण श्रुति कार्यक्रम का मॉडल तैयार किया। इसमें मूक-बधिर बच्चों को चिह्नित करने, श्रवण यंत्र देने, काक्लियर इम्प्लांट और इसके बाद डेढ़ से दो वर्ष निशुल्क फिजियोथेरेपी तक की व्यवस्था की गई।
इन बच्चों को सामान्य बना समाज की मुख्यधारा में जोड़ने में गरीबी आड़े नहीं आए इसलिए काक्लियर इम्प्लांट के लिए माता-पिता को भेजने, खाने-रहने से लेकर स्पीच थेरेपी सेंटर तक जाने का खर्च भी दिया जाता है।
पटना का डीएम बनने के बाद जून माह में फुलवारीशरीफ व दानापुर में पायलट प्रोजेक्ट के तहत जो शुरुआत की, अगस्त 2025 में स्वास्थ्य एवं विधि विभाग के मंत्री मंगल पांडेय ने पूरे प्रदेश में लागू कर दिया। इस कार्यक्रम की विश्वस्तर पर सराहना हुई और इसे नेशनल समिट आन बेस्ट प्रैक्टिसेज के लिए चुना गया। बिहार के स्वास्थ्य मंत्री ने इसे राष्ट्रीय नीति में शामिल करने की अनुशंसा की।
बिना अतिरिक्त बजट, बड़ा बदलाव
छह वर्ष तक के बच्चों का काक्लियर इम्प्लांट करा उन्हें मूक-बधिरता के अभिशाप से पूरी तरह से निजात दिला विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। इसमें सबसे बड़ी बाधा महंगा उपचार था। सर्जरी व उपकरण पर ही सात से 10 लाख का खर्च आता है। इसके बाद डेढ़ से दो वर्ष तक स्पीच थेरेपी।
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गया के एक गरीब पिता की इस पीड़ा ने डॉ. त्यागराजन को सोने नहीं दिया। उन्होंने तमाम केंद्र-राज्य सरकार की योजनाओं का अध्ययन किया। दिव्यांगों को सहायक उपकरण देने वाली भारत सरकार की एडीआईपी (स्कीम आफ असिस्टेट टू डिसेबल पर्संस फॉर पर्चेज-फिटिंग आफ एड्स-एप्लायंसेस) के साथ राज्य स्वास्थ्य समिति व समाज कल्याण विभाग की योजनाओं को मिलाकर श्रवण श्रुति कार्यक्रम शुरू किया।
काक्लियर इम्प्लांट के लिए प्रदेश में केंद्र से सम्बद्ध कोई केंद्र नहीं होने से उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित स्व. एसएन मेहरोत्रा मेमोरियल ईएनटी फाउंडेशन से समझौता किया। जिले में उपलब्ध ओएई (ओटोएकास्टिक एमिशन) मशीनों व ऑडियोलाजिस्ट का पैनल बनाकर आंगनबाड़ी केंद्रों में जा-जाकर ऐसे बच्चों को चिह्नित करने के लिए स्क्रीनिंग अभियान शुरू किया।
छह माह में 500 सर्जरी कराने का लक्ष्य
सच्चा नेतृत्व पद से नहीं, दृष्टि व करुणा से पैदा होता है। डॉ. त्यागराजन एसएम ने दिखा दिया कि जब प्रशासन मानवीय संवेदना से जुड़ता है, तब नीतियां कागज से निकलकर बच्चों की मुस्कान बन जाती हैं। श्रवण श्रुति उन आवाज़ों का नाम है, जो अब खामोश नहीं रहीं, यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।
इस कार्यक्रम के तहत अबतक आंगनबाड़ी केंद्रों 3.5 लाख से अधिक बच्चों की स्क्रीनिंग कर 105 बच्चों को काक्लियर इम्प्लांट के लिए चिह्नित किया गया। अबतक 80 बच्चों का काक्लियर इम्प्लांट हो चुका है। इनमें से कई स्पीच थेरेपी के बाद अब सामान्य जीवन जी रहे हैं। इसके अतिरिक्त 1769 बच्चों को श्रवण यंत्र दिए जा चुके हैं।
नववर्ष पर डॉ. त्यागराजन ने पटना को मूक-बधिर मुक्त बनाने का संकल्प लिया है। पटना में सिर्फ जुलाई से नवंबर के बीच 66,434 बच्चों की जांच की गई। इसमें 160 बच्चों में श्रवण समस्या पाई गई। कान का अंदरूनी हिस्सा काक्लिया ठीक से काम कर रहा है कि नहीं, बेरा जांच के बाद इनमें से 56 बच्चों को काक्लियर इम्प्लांट के लिए चिह्नित किया गया। इनमें से 45 बच्चों को इम्प्लांट के लिए कानपुर भेजा गया है और 32 की सर्जरी सफलता पूर्वक हो चुकी है।
अगले छह माह में पटना के 500 बच्चों की काक्लियर इम्प्लांट सर्जरी का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए स्वास्थ्य, आईसीडीएस, शिक्षा, जीविका, समाज कल्याण, ग्रामीण विकास, कल्याण, सिविल सोसायटी, माता-पिता समेत सभी संबंधित लोगों को इस मिशन से जोड़ा गया है।
तीन पीढ़ियों में पहली बार बोला कोई बच्चा
डॉ. त्यागराजन एसएम ने बताया कि गया के गुरुआ प्रखंड में एक परिवार ऐसा था, जिसके परिवार में आनुवंशिक रूप से मूक-बधिरता की समस्या थी। उनके दादा-दादी, माता-पिता और बच्चा तक जन्मजात मूक-बधिर था। जब श्रवण श्रुति कार्यक्रम से उस परिवार के पहले बच्चे ने बोलना-सुनना शुरू किया तो उस परिवार की खुशी देख जो संतुष्टि मिली, उसने इस कार्यक्रम को सफल बनाने में संजीवनी का कार्य किया।
देश में प्रति हजार जन्म लेने वाले बच्चों में से 5 से 8 मूक-बधिर होते हैं। छह वर्ष से कम उम्र में यदि श्रवण समस्या की पहचान हो जाए तो सही उपचार, सर्जरी या नियमित स्पीच थेरेपी से सुनने-बोलने की क्षमता काफी हद तक या पूरी तरह वापस लाई जा सकती है। छह वर्ष के बाद इलाज पर बच्चे में भाषा व बोलने की का विकास कठिन हो जाता है। उपचार, सर्जरी व स्पीच थेरेपी में माता-पिता की सक्रिय भागीदारी जरूरी है, उन्हें आगे आना होगा ताकि एक भी बच्चा छूटे नहीं।
डॉ. त्यागराजन एसएम, जिलाधिकारी पटना