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    शराबबंदी पर नई रिसर्च से बिहार में फिर गरमाई बहस, NCAER के शोध पत्र ने नीति पर उठाए सवाल

    Updated: Sat, 08 Aug 2026 08:16 PM (IST)

    NCAER के एक शोध पत्र ने बिहार में शराबबंदी की नीति पर सवाल उठाए हैं, जिसमें दावा किया गया है कि यह अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाई है। शोध मे ...और पढ़ें

    अवैध शराब के कारोबार को लेकर भी चिंता

    अवैध शराब के कारोबार को लेकर भी चिंता

    HighLights

    1. NCAER शोध ने बिहार शराबबंदी नीति पर उठाए सवाल।

    2. राजस्व वृद्धि और अवैध कारोबार बढ़ने का दावा किया।

    3. महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कमी के प्रमाण नहीं मिले।

    राज्य ब्यूरो, पटना। बिहार में शराबबंदी को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो सकती है। नेशनल काउंसिल आफ एप्लाइड इकानामिक रिसर्च यानी NCAER के बिहार से संबंधित एक शोध पत्र में शराबबंदी की मौजूदा नीति पर सवाल उठाए गए हैं।

    शोध पत्र में दावा किया गया है कि शराबबंदी अपने घोषित लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाई है। इसमें आर्थिक और सामाजिक स्तर पर इसके असर का भी विश्लेषण किया गया है।

    शोध पत्र में शराबबंदी समाप्त करने के पक्ष में आर्थिक तर्क भी दिए गए हैं। हालांकि ये निष्कर्ष शोध पत्र के दावे हैं, जिन पर बिहार में राजनीतिक और सामाजिक बहस होना तय माना जा रहा है।

    राजस्व बढ़ाने से लेकर खर्च घटाने तक का तर्क

    शोध पत्र में शराबबंदी समाप्त करने के पक्ष में मुख्य रूप से दो आर्थिक तर्क दिए गए हैं। पहला दावा है कि शराबबंदी हटने पर राज्य के आंतरिक राजस्व स्रोत में 14 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।

    दूसरा तर्क शराबबंदी को लागू रखने पर होने वाले सरकारी खर्च से जुड़ा है। अवैध शराब के कारोबार पर रोक लगाने और कानून लागू कराने में भी सरकार को खर्च करना पड़ता है।

    शोध पत्र के अनुसार शराबबंदी समाप्त होने पर इस तरह के खर्च में भी कमी आ सकती है। इसी आधार पर अध्ययन में इसे राज्य के आर्थिक हित से जोड़कर देखा गया है।

    महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर भी उठाया सवाल

    शराबबंदी लागू करने के पीछे घरेलू हिंसा में कमी लाने का तर्क भी प्रमुख रहा था। शोध पत्र में इसी दावे की पड़ताल करते हुए कहा गया है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कमी का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिल रहा है।

    अध्ययन के मुताबिक शराबबंदी लागू करते समय उम्मीद की गई थी कि इससे घरेलू हिंसा घटेगी। साथ ही शराब पर खर्च होने वाला पैसा परिवार की दूसरी जरूरतों पर खर्च होने की उम्मीद थी।

    इसी वजह से महिलाओं के बीच भी शराबबंदी की मांग को समर्थन मिला था। लेकिन शोध पत्र के निष्कर्ष इस अपेक्षित सामाजिक असर पर सवाल खड़े करते हैं।

    अवैध शराब के कारोबार को लेकर भी चिंता

    शोध पत्र में दावा किया गया है कि शराबबंदी के बाद अवैध शराब का कारोबार बढ़ा है। इसके साथ ही अध्ययन में शराब पीने वालों की संख्या बढ़ने का भी दावा किया गया है।

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    शराब के विकल्प के तौर पर दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की बात भी शोध में कही गई है। इससे शराबबंदी के बाद पैदा हुए अवैध बाजार और उसके सामाजिक प्रभाव पर सवाल उठते हैं।

    शोध पत्र में अवैध गतिविधियों को अपराध और भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी के संभावित कारकों से भी जोड़ा गया है। हालांकि इन निष्कर्षों को समझने के लिए अध्ययन की पद्धति और आंकड़ों को देखना भी महत्वपूर्ण होगा।

    रत्ना सहाय का शोध पत्र इंडिया पालिसी फोरम में रखा गया

    बिहार में शराबबंदी से जुड़े इस अध्ययन को रत्ना सहाय की ओर से तैयार किया गया है। शोध पत्र को इंडिया पालिसी फोरम में प्रस्तुत किया गया है।

    इसमें शराबबंदी के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का आकलन करने की कोशिश की गई है। अध्ययन ने नीति के घोषित उद्देश्यों और उसके कथित वास्तविक परिणामों के बीच अंतर की ओर ध्यान खींचा है।

    खास तौर पर राजस्व, अवैध कारोबार और महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे मुद्दों को इसमें प्रमुखता दी गई है। अब इस शोध के निष्कर्ष बिहार की शराबबंदी नीति पर आगे होने वाली बहस में अहम संदर्भ बन सकते हैं।

    शराबबंदी रहे या हटे, बहस फिर सामने

    NCAER के इस शोध पत्र ने बिहार में शराबबंदी को लेकर एक पुराने सवाल को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ नीति के सामाजिक उद्देश्यों को लेकर तर्क हैं, तो दूसरी ओर राजस्व और अवैध कारोबार से जुड़े सवाल हैं।

    शोध पत्र ने शराबबंदी समाप्त करने के आर्थिक लाभ की संभावना जताई है। वहीं इसके सामाजिक लक्ष्यों की उपलब्धि पर भी सवाल उठाए गए हैं।

    फिलहाल यह शोध एक अध्ययन का निष्कर्ष है, अंतिम सरकारी निर्णय नहीं। लेकिन इतना तय है कि बिहार की शराबबंदी पर बहस अब एक बार फिर आंकड़ों, राजस्व और सामाजिक असर के सवालों के बीच पहुंच गई है।