गजब संयोग: मार्च में ही पहली बार ली थी CM पद की शपथ, अब मार्च में ही कुर्सी छोड़ रहे नीतीश कुमार
नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं। उनका मुख्यमंत्री सफर मार्च 2000 में शुरू हुआ था और अब मार्च में ह ...और पढ़ें

नीतीश कुमार छोड़ेंगे सीएम की कुर्सी, जाएंगे राज्यसभा (फाइल फोटो)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, पटना। बिहार की सियासत में पिछले ढाई दशकों से धुरी बने रहे नीतीश कुमार ने एक बेहद चौंकाने वाले फैसले के साथ अपने मुख्यमंत्री काल के अध्याय पर विराम लगाने का मन बना लिया है।
खुद नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया (एक्स) के जरिए साझा किया कि उनकी अगली पारी राज्यसभा (Nitish Kumar Rajya Sabha Nomination) के सदस्य के रूप में शुरू होगी।
संयोग देखिए कि नीतीश कुमार ने अपने मुख्यमंत्री सफर की शुरुआत भी मार्च (2000) में की थी और अब पद छोड़ने का बड़ा फैसला भी इसी महीने में लिया है।

मार्च से मार्च तक का अनूठा सफर
नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री के रूप में सफर जितना लंबा रहा, उतना ही नाटकीय भी। उनके नाम कई दिलचस्प रिकॉर्ड दर्ज हैं:
पहली पारी (2000): 3 मार्च 2000 को वे पहली बार सीएम बने, लेकिन बहुमत की कमी के चलते मात्र 7 दिनों में 10 मार्च को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
विकास का दौर (2005-2010): 2005 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटे और बिहार में कानून-व्यवस्था व बुनियादी ढांचे में सुधार कर 'सुशासन बाबू' की पहचान बनाई। 2010 में उन्होंने तीसरी बार शपथ ली और अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा किया।

गठबंधन और करवटें (2015-2024): 2015 से 2024 के बीच बिहार ने नीतीश कुमार को कई बार पाला बदलते देखा। कभी आरजेडी के साथ 'महागठबंधन' तो कभी भाजपा के साथ 'एनडीए', नीतीश ने कुल 9 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर भारतीय राजनीति में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।
ऐतिहासिक दसवीं शपथ (2025): हाल ही में 20 नवंबर 2025 को उन्होंने दसवीं बार सूबे की कमान संभाली थी, जो उनके राजनीतिक रसूख का प्रमाण है।
'सुशासन बाबू' से 'पलटू मास्टर' तक की छवि
नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन को दो विशेषणों से सबसे ज्यादा पहचाना गया। जहां शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके काम ने उन्हें 'सुशासन बाबू' बनाया, वहीं सत्ता की जरूरतों के हिसाब से गठबंधन बदलने की कला ने उन्हें विरोधियों के बीच 'पलटू मास्टर' के रूप में चर्चित कर दिया। हालांकि, इन आलोचनाओं के बीच भी यह सच बना रहा कि बिहार की सत्ता का केंद्र बिंदु हमेशा वही रहे।
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एक युग का अंत
नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना न केवल बिहार बल्कि देश की राजनीति के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत है। गठबंधन की कला में माहिर नीतीश ने यह साबित किया कि संख्या बल कुछ भी हो, सत्ता की चाबी अपने पास कैसे रखी जाती है।
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अब जब वे दिल्ली की राजनीति की ओर रुख कर रहे हैं, तो बिहार में उनके उत्तराधिकारी और भविष्य के समीकरणों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।