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    आपराधिक इतिहास छिपाना पड़ा भारी, पटना हाईकोर्ट ने रद की जमानत; सेशंस जज के आदेश पर भी उठाए गंभीर सवाल

    Updated: Fri, 07 Aug 2026 09:26 PM (IST)

    पटना हाईकोर्ट ने हत्या के प्रयास के आरोपी की जमानत रद्द कर दी, क्योंकि उसने अपना आपराधिक इतिहास छिपाया था और निचली अदालत ने मेडिकल साक्ष्यों की अनदेखी ...और पढ़ें

    पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट

    HighLights

    1. आरोपी ने आपराधिक इतिहास छिपाया, निचली अदालत ने अनदेखी की।

    2. मेडिकल रिपोर्ट और केस डायरी को निचली अदालत ने नजरअंदाज किया।

    3. हाईकोर्ट ने जमानत रद्द कर प्रशासनिक कार्रवाई का निर्देश दिया।

    विधि संवाददाता,पटना। हत्या के प्रयास के आरोपी को मिली जमानत रद करते हुए पटना हाईकोर्ट ने न केवल आरोपी के तथ्य छिपाने पर सवाल उठाए, बल्कि निचली अदालत की जमानत प्रक्रिया पर भी गंभीर टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी ने अपना पूरा आपराधिक इतिहास अदालत के सामने नहीं रखा था।

    न्यायाधीश संदीप कुमार की एकलपीठ ने यह भी पाया कि निचली अदालत ने उपलब्ध मेडिकल साक्ष्यों और केस डायरी में दर्ज तथ्यों की अनदेखी की।

    सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि जमानत उस दिन मंजूर की गई, जिस दिन मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध ही नहीं था।

    मेडिकल रिपोर्ट कुछ और, जमानत आदेश में कुछ और

    हाईकोर्ट ने केस रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद तीन परिस्थितियों को असाधारण माना। पहली, मेडिकल रिपोर्ट के विपरीत निष्कर्ष दर्ज किए गए।

    दूसरी, जमानत याचिका का असामान्य तेजी से निस्तारण हुआ और तीसरी, जिस दिन जमानत दी गई उस दिन मामला सूचीबद्ध ही नहीं था।

    अदालत ने इन परिस्थितियों को न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिहाज से गंभीर माना। आदेश की प्रति और पूरा रिकॉर्ड कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रशासनिक कार्रवाई के लिए रखने का निर्देश दिया गया।

    ‘आधा सच भी सच नहीं’, आपराधिक इतिहास छिपाने पर तल्ख टिप्पणी

    हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी द्वारा अपने आपराधिक इतिहास का चयनात्मक खुलासा न्यायालय को गुमराह करने के समान है।

    अदालत के अनुसार, जमानत पर विचार करते समय आरोपी का आपराधिक पूर्ववृत्त, अपराध की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण कारक होते हैं।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालत ने आरोपी का आपराधिक इतिहास मंगाने की जरूरत तक नहीं समझी, जबकि जमानत पर निर्णय के लिए यह महत्वपूर्ण तथ्य था।

    पीएमसीएच की रिपोर्ट में गोली लगने की पुष्टि

    मामला दीघा थाना क्षेत्र में जमीन विवाद को लेकर छह जून 2024 को हुई फायरिंग से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के अनुसार, मुख्य आरोपी ने उसके पुत्र की कनपटी पर गोली चलाई, जो चूक गई, जबकि दूसरी गोली पैर में लगी।

    पीएमसीएच की मेडिकल रिपोर्ट में गोली लगने और पैर में फॉरेन बॉडी मौजूद होने की पुष्टि हुई थी। हाईकोर्ट ने पाया कि इसके बावजूद निचली अदालत के जमानत आदेश में आग्नेयास्त्र से चोट के संकेत नहीं होने की टिप्पणी की गई थी।

    रिकॉर्ड के विपरीत टिप्पणी को हाईकोर्ट ने माना गंभीर

    हाईकोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट की गलत व्याख्या को रिकॉर्ड के विपरीत और न्यायिक दृष्टि से गंभीर माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत आदेश यदि प्रासंगिक तथ्यों की अनदेखी, अप्रासंगिक आधारों या तथ्यों के दमन पर आधारित हो तो उसे निरस्त किया जा सकता है।

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    अदालत ने कहा कि ऐसे आदेश को रद करने के लिए यह जरूरी नहीं कि आरोपी ने जमानत मिलने के बाद उसका दुरुपयोग किया हो।

    यदि आदेश शुरुआत से ही कानून के अनुरूप नहीं है तो उच्च न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है।

    आरोपी को आत्मसमर्पण का निर्देश

    इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत रद कर दी और उसे निर्धारित अवधि के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

    साथ ही पूरे मामले का रिकॉर्ड कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया, ताकि न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े पहलुओं पर आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई पर विचार किया जा सके।

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