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    बांकीपुर स्टेशन से पटना जंक्शन तक...; 164 साल में ऐसे बदली बिहार की रेल तस्वीर

    Updated: Sun, 12 Jul 2026 10:19 AM (IST)

    पटना जंक्शन ने 1862 में बांकीपुर स्टेशन के रूप में स्थापित होने से लेकर बिहार की जीवनरेखा बनने तक 164 वर्षों का सफर तय किया है। यह स्टेशन बिहार के आर् ...और पढ़ें

    कभी ऐसा द‍िखता था पटना जंक्‍शन। सौ-रेलवे

    कभी ऐसा द‍िखता था पटना जंक्‍शन। सौ-रेलवे

    HighLights

    1. पटना जंक्शन 1862 में बांकीपुर स्टेशन के रूप में स्थापित हुआ।

    2. यह बिहार के आर्थिक, सामाजिक बदलावों का प्रमुख साक्षी रहा।

    3. अब मेट्रो, रैपिड रेल से मल्टी-मॉडल हब बन रहा।

    विद्या सागर, पटना। यदि बिहार के इतिहास को रेल की पटरियों पर पढ़ा जाए तो उसकी सबसे महत्वपूर्ण कहानी पटना जंक्शन से होकर गुजरती है।

    यह केवल एक रेलवे स्टेशन नहीं, बल्कि बिहार की अर्थव्यवस्था, व्यापार, संस्कृति, राजनीति और सामाजिक बदलाव का साक्षी है।

    जिस शहर में कभी गंगा के घाटों से नावों पर माल लादकर कोलकाता भेजा जाता था, वहीं आज प्रतिदिन तीन लाख से अधिक यात्री रेल यात्रा करते हैं।

    सैकड़ों ट्रेनें देश के लगभग हर प्रमुख महानगर को जोड़ती हैं। अब इसी शहर में मेट्रो रेल दौड़ रही है और भविष्य में रैपिड रेल तथा हाई स्पीड रेल कारिडोर की योजनाएं भी आकार ले रही हैं।

    सन् 1862 में स्थापित पटना जंक्शन का सफर भारत में रेलवे के शुरुआती इतिहास से जुड़ा हुआ है। लगभग डेढ़ शताब्दी से अधिक समय में इस स्टेशन ने अंग्रेजी शासन, स्वतंत्रता आंदोलन, विभाजन, आजादी, औद्योगिक विकास, हरित क्रांति, उदारीकरण और आधुनिक भारत सभी दौर देखे हैं।

    यही कारण है कि पटना जंक्शन का इतिहास केवल रेलवे का इतिहास नहीं बल्कि बिहार के विकास का दस्तावेज भी है।

    Patna Junction 4

    (दानापुर जंक्‍शन की तस्‍वीर।)

    गंगा के रास्ते चलता था व्यापार

    उन्नीसवीं सदी के मध्य तक बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का अधिकांश व्यापार गंगा नदी पर निर्भर था। यहां का अनाज, अफीम, नील, कपड़ा, नमक, लकड़ी और अन्य कृषि उत्पाद नावों के माध्यम से कोलकाता भेजे जाते थे।

    वहां से इन्हें समुद्री जहाजों में भरकर इंग्लैंड और अन्य देशों तक पहुंचाया जाता था।अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती समय और लागत थी।

    बरसात में गंगा का जलस्तर बदल जाता था, जबकि गर्मी में कई स्थानों पर नौवहन कठिन हो जाता था। ऐसे में तेज और भरोसेमंद परिवहन व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की गई।

    16 अप्रैल 1853 को मुंबई और ठाणे के बीच भारत की पहली यात्री ट्रेन चलने के बाद अंग्रेजों ने यह समझ लिया कि रेलवे ही भविष्य का सबसे बड़ा परिवहन माध्यम बनेगा। इसके बाद पूर्वी भारत में भी रेलवे विस्तार की योजनाएं तेज हो गईं।

    Patna Junction 2

    (पटना जंक्शन परिसर में रखा पुराना इंजन।)

    1855 में रखी गई पटना स्टेशन की नींव, बनाई गई दो रेल लाइनें

    पटना की व्यावसायिक महत्ता को देखते हुए 1855 में यहां रेलवे स्टेशन के निर्माण की नींव रखी गई। लगभग सात वर्षों के निर्माण के बाद 1862 में स्टेशन तैयार हुआ।

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    उस समय इसका नाम बांकीपुर स्टेशन रखा गया था, क्योंकि तत्कालीन प्रशासनिक और व्यावसायिक केंद्र बांकीपुर क्षेत्र था। स्टेशन बनने के साथ ही अंग्रेजों ने इसे केवल यात्री स्टेशन नहीं बल्कि माल परिवहन केंद्र के रूप में विकसित किया।

    बांकीपुर से दो महत्वपूर्ण शाखा रेल लाइनें बनाई गईं। पहला पटना जंक्शन से दीघा घाट तक व दूसरा पटना घाट तक। इन दोनों घाटों का उस समय अत्यंत महत्व था।

    वाराणसी और कोलकाता जाने वाले अधिकांश माल और यात्रियों का आवागमन यहीं से होता था। रेल और जल परिवहन का यह अनोखा संगम उस दौर की सबसे आधुनिक लाजिस्टिक व्यवस्था माना जाता था।

    Patna Junction

    (वर्तमान में पटना जंक्‍शन।)

    जब पशु खींचते थे रेल की बोगियां

    रेलवे के शुरुआती दिनों में इंजन और ट्रैक की सीमित उपलब्धता के कारण कई स्थानों पर माल ढुलाई के लिए पशुओं की सहायता ली जाती थी।

    पटना क्षेत्र में भी शुरुआती दौर में रेल की कुछ बोगियों को बैलों, घोड़ों और हाथियों की मदद से खींचे जाने के उल्लेख मिलते हैं।

    धीरे-धीरे भाप इंजन आने लगे और फिर नियमित रेल संचालन शुरू हुआ। यही वह समय था जब पटना पूर्वी भारत के सबसे महत्वपूर्ण माल ढुलाई केंद्रों में शामिल होने लगा।

    गंगा नहीं, रेलवे बना नई अर्थव्यवस्था की धुरी

    अंग्रेजों ने जल्दी ही समझ लिया कि यदि बिहार को रेलवे से जोड़ दिया जाए तो व्यापार कई गुना बढ़ सकता है। इसके बाद पटना से हावड़ा तथा पटना से वाराणसी तक रेलवे लाइन बिछाने का कार्य युद्धस्तर पर शुरू हुआ।

    रेलवे केवल यात्रियों के लिए नहीं बल्कि प्रशासन, सेना और व्यापार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इसी कारण बड़े-बड़े पुलों का निर्माण कराया गया।

    कोइलवर रेल सह सड़क पुल ने बदल दी तस्वीर

    सोन नद हमेशा से बिहार की सबसे चुनौतीपूर्ण नदियों में रही है। इसकी चौड़ाई और तेज धारा के कारण रेलवे लाइन बिछाना आसान नहीं था।

    1862 में लगभग 1.44 किलोमीटर लंबे रेल सह सड़क पुल का निर्माण पूरा हुआ और 4 नवंबर 1862 को इस पर रेल परिचालन शुरू हुआ। उस समय यह एशिया के सबसे बड़े पुलों में गिना जाता था।

    इसके अलावा पुनपुन, किउल सहित कई नदियों पर भी रेलवे पुल बनाए गए। इन पुलों ने बिहार को पहली बार एक मजबूत रेल नेटवर्क से जोड़ दिया।

    उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने की दिशा

    गंगा बिहार को दो हिस्सों में बांटती थी। उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार के बीच संपर्क सीमित था। हथीदह क्षेत्र में रेल संपर्क विकसित होने के बाद उत्तर बिहार तक रेलवे पहुंची।

    आगे चलकर स्वतंत्र भारत में बने राजेंद्र सेतु ने इस संपर्क को और मजबूत किया तथा बिहार के रेल मानचित्र को नई दिशा दी। राजेंद्र सेतु पुल का उद्घाटन करने तत्कालिन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पटना पहुंचे थे।

    पहली प्रतिष्ठित ट्रेनों का दौर

    रेलवे लाइन तैयार होने के बाद मालगाड़ियों के साथ यात्री ट्रेनों का संचालन भी शुरू हुआ। पूर्वी भारत से दिल्ली की ओर जाने वाली महत्वपूर्ण ट्रेनों में लालकिला एक्सप्रेस का विशेष स्थान रहा।

    शुरुआती वर्षों में यह मुख्य रूप से प्रशासनिक उपयोग के लिए संचालित होती थी। पूर्व रेलवे की ओर से आजादी के पहले ही इस रेलवे ट्रैक पर आम जनता के लिए लालकिला एक्सप्रेस की शुरूआत की गई थी।

    इस ट्रेन की पहली ट्रिप 1866 को ही चलाया गया था परंतु उस वक्त इस ट्रेन से आम लोगों को यात्रा की अनुमति नहीं दी गई थी।

    बाद में इसे आम जनता के लिए शुरू कर दिया गया था। इस ट्रेन में तृतीय व द्वितीय श्रेणी की बोगियां थी। यह ट्रेन काफी धीमी रफ्तार से 67 स्टेशनों पर रुकती हुई लगभग 40 घंटे में हावड़ा से दिल्ली पहुंचती थी। बाद में 30 जून 2014 से इसे बंद कर दिया गया।

    Patna Metro

    आजादी के बाद बदलने लगी रेल की तस्वीर

    स्वतंत्रता के बाद रेलवे का उद्देश्य केवल व्यापार नहीं बल्कि आम नागरिकों को जोड़ना बन गया। 1 अक्टूबर 1948 को पटना से दिल्ली के लिए जनता एक्सप्रेस शुरू की गई।

    यह बिहार के यात्रियों के लिए बड़ी उपलब्धि थी। बाद में इसका विस्तार हावड़ा तक किया गया और यह पूर्वी भारत की महत्वपूर्ण ट्रेनों में शामिल हो गई।

    यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ती गई और पटना जंक्शन का महत्व भी बढ़ता चला गया। इस ट्रेन के सारे डिब्बे तृतीय श्रेणी के ही रखे गए थे। धीमी रफ्तार के कारण इसे भी एक अगस्त 2014 से बंद कर दिया गया।

    1900 में खुला पटना-गया रेलखंड

    पटना को ग्रैंड कार्ड लाइन से जोड़ने के लिए लगभग 1900 में पटना-गया रेलखंड शुरू किया गया। इस लाइन ने बिहार के दक्षिणी हिस्से, गया, झारखंड तथा आगे मध्य भारत से संपर्क मजबूत किया।

    पहले यहां मालगाड़ियां चलीं, फिर यात्री ट्रेनों का संचालन शुरू हुआ। आज यह पूरी तरह विद्युतीकृत एवं दोहरीकृत रेलखंड है और पूर्व मध्य रेल के सबसे व्यस्त मार्गों में शामिल है।

    दानापुर : पूर्वी भारत का रणनीतिक रेल मुख्यालय

    पटना जंक्शन की कहानी दानापुर के बिना अधूरी है। दानापुर का महत्व अंग्रेजी शासन में सैनिक छावनी के कारण पहले से था। रेलवे आने के बाद यह परिचालन का बड़ा केंद्र बन गया।

    1925 में दानापुर रेल मंडल की स्थापना की गई। 1928 में इसका प्रशासनिक भवन तैयार हुआ। प्रारंभ में यह ईस्ट इंडियन रेलवे के अधीन रहा।

    बाद में पूर्व रेलवे का हिस्सा बना और 1 अक्टूबर 2002 को पूर्व मध्य रेलवे बनने के बाद दानापुर मंडल नई ज़ोन का प्रमुख मंडल बन गया।

    दिल्ली-हावड़ा मुख्य रेलमार्ग का बड़ा हिस्सा इसी मंडल के अंतर्गत आता है। माल परिवहन, कंटेनर ट्रैफिक, कोयला, सीमेंट, खाद्यान्न तथा यात्री सेवाओं के संचालन में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    दानापुर स्टेशन का अपना गौरव

    दानापुर स्टेशन बिहार के सबसे पुराने स्टेशनों में गिना जाता है। सैनिक छावनी होने के कारण अंग्रेजी काल से ही यहां ट्रेनों का ठहराव रहा।

    आज यह केवल उपनगरीय स्टेशन नहीं बल्कि लंबी दूरी की अनेक महत्वपूर्ण ट्रेनों का प्रमुख ठहराव है। यहां से उत्तर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लिए बड़ी संख्या में यात्री यात्रा करते हैं।

    नई लाइनें, यार्ड विस्तार और आधुनिक सिग्नल प्रणाली ने इसे और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

    पटना साहिब : आस्था और रेलवे का संगम

    पटना साहिब स्टेशन का इतिहास धार्मिक महत्व से जुड़ा हुआ है। दसवें सिख गुरु गुरु गोबिंद सिंह की जन्मस्थली तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए यह स्टेशन जीवनरेखा है।

    ब्रिटिश काल में यहां मुख्य रूप से स्थानीय यातायात के लिए स्टेशन बनाया गया था, लेकिन समय के साथ इसका महत्व लगातार बढ़ता गया।

    आज देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु सबसे अधिक इसी स्टेशन का उपयोग करते हैं। स्टेशन का आधुनिकीकरण, बेहतर प्लेटफार्म, यात्री सुविधाएं और धार्मिक पर्यटन के अनुरूप विकास इसे बिहार के प्रमुख स्टेशनों में शामिल करता है।

    बांकीपुर से पटना जंक्शन बनने तक

    समय के साथ बांकीपुर स्टेशन का नाम बदलकर पटना जंक्शन कर दिया गया। स्टेशन लगातार विस्तार करता गया। जहां कभी केवल चार प्लेटफसर्म थे, वहीं आज दस प्लेटफार्म हैं।

    आधुनिक फुट ओवरब्रिज, एस्केलेटर, लिफ्ट, वातानुकूलित प्रतीक्षालय, डिजिटल सूचना प्रणाली, स्वचालित टिकटिंग, सीसीटीवी निगरानी और बेहतर पार्किंग जैसी सुविधाओं ने इसे आधुनिक स्वरूप दिया है।

    राजेंद्र नगर और पाटलिपुत्र स्टेशन क्यों बने

    जैसे-जैसे यात्रियों की संख्या बढ़ी, पटना जंक्शन पर दबाव भी बढ़ता गया। इसी कारण राजेंद्र नगर टर्मिनल विकसित किया गया ताकि कई लंबी दूरी की ट्रेनों का प्रारंभ और समापन वहां से हो सके।

    बाद में उत्तर बिहार और पश्चिम दिशा की ट्रेनों के बेहतर संचालन के लिए पाटलिपुत्र जंक्शन बनाया गया। इससे दानापुर होकर गुजरने वाली ट्रेनों का संचालन अधिक व्यवस्थित हुआ।

    आज पटना शहर में पटना जंक्शन, दानापुर, पाटलिपुत्र, राजेंद्र नगर टर्मिनल, पटना साहिब, गुलजारबाग, फुलवारीशरीफ और सचिवालय हाल्ट मिलकर एक विशाल शहरी रेल नेटवर्क का निर्माण करते हैं।

    आज का पटना जंक्शन

    आज पटना जंक्शन पूर्व मध्य रेलवे का सबसे व्यस्त स्टेशन है। प्रतिदिन 200 से अधिक ट्रेनें यहां से गुजरती हैं या रुकती हैं।

    दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, अहमदाबाद, जयपुर, जम्मू, गुवाहाटी, भुवनेश्वर, पुरी, रांची, वाराणसी, लखनऊ, अमृतसर और देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों के लिए यहां से रेल संपर्क उपलब्ध है। प्रतिदिन लाखों यात्री इस स्टेशन का उपयोग करते हैं।

    हार्डिंग पार्क जहां पहले था बस अड्डा, अब बन रहा पैसेंजर टर्मिनल

    पटना के हार्डिंग पार्क परिसर, जहां कभी शहर का प्रमुख अंतरराज्यीय बस अड्डा हुआ करता था, अब आधुनिक पैसेंजर टर्मिनल के रूप में विकसित किया जा रहा है।

    वर्षों तक यह स्थान बिहार और पड़ोसी राज्यों के लिए बस संचालन का मुख्य केंद्र रहा, लेकिन मीठापुर और अन्य स्थानों पर बस अड्डे के स्थानांतरण के बाद यह परिसर लगभग निष्क्रिय हो गया था।

    अब रेलवे यहां यात्रियों की सुविधा के लिए अत्याधुनिक पैसेंजर टर्मिनल बना रहा है। इसके निर्माण से पटना जंक्शन आने-जाने वाले यात्रियों को बेहतर प्रतीक्षालय, पार्किंग, यात्री सुविधाएं और सुगम आवागमन उपलब्ध होगा।

    बदल रही है पूरी रेल संरचना

    दिल्ली-हावड़ा मुख्य रेलमार्ग पर लगातार बढ़ते ट्रैफिक को देखते हुए तीसरी और चौथी रेल लाइन का निर्माण तेजी से किया जा रहा है।

    इलेक्ट्रानिक इंटरलाॅकिंग, स्वचालित सिग्नलिंग, कवच जैसी सुरक्षा प्रणाली और उच्च क्षमता वाले ट्रैक भविष्य की जरूरतों के अनुसार विकसित किए जा रहे हैं। इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद ट्रेनों की गति और समयपालन दोनों में सुधार होगा।

    पटना पहुंच चुकी है मेट्रो

    रेल इतिहास का नया अध्याय तब शुरू हुआ जब पटना में मेट्रो रेल सेवा का संचालन प्रारंभ हुआ। पूर्वी भारत के तेजी से विकसित हो रहे शहरों में शामिल पटना अब केवल रेलवे जंक्शन नहीं बल्कि मल्टी-माेडल ट्रांसपोर्ट हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    पटना मेट्रो के पहले चरण में दो कारिडोर विकसित किए जा रहे हैं। पहला काॅरिडोर दानापुर कैंट से खेमनीचक तक तथा दूसरा पटना जंक्शन से न्यू आइएसबीटी तक बनाया जा रहा है।

    इन दोनों काॅरिडोरों की कुल लंबाई लगभग 31 किलोमीटर है। परियोजना में एलिवेटेड और भूमिगत (अंडरग्राउंड) दोनों प्रकार के ट्रैक शामिल हैं।

    भूमिगत हिस्से का निर्माण अत्याधुनिक टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) से किया जा रहा है। परियोजना का निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है।

    न्यू आइएसबीटी से मलाही पकड़ी तक का प्राथमिक खंड यात्रियों के लिए शुरू हो चुका है, जिससे पूर्वी पटना के लोगों को बेहतर परिवहन सुविधा मिलने लगी है।

    वहीं, गांधी मैदान, पटना जंक्शन, राजेंद्र नगर और अन्य भूमिगत स्टेशनों पर निर्माण कार्य भी अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है। पटना मेट्रो पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं से लैस होगी।

    स्टेशनों पर एस्केलेटर, लिफ्ट, सीसीटीवी निगरानी, स्वचालित टिकट प्रणाली, स्मार्ट कार्ड, डिजिटल सूचना डिस्प्ले और दिव्यांगजन के लिए विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

    मेट्रो ट्रेनों में वातानुकूलित कोच, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और आरामदायक यात्रा का अनुभव मिलेगा। भविष्य में मेट्रो और भारतीय रेल का एकीकृत नेटवर्क यात्रियों को बिना अधिक समय गंवाए शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचाने में मदद करेगा।

    अब रैपिड रेल की तैयारी

    राजधानी क्षेत्र के विस्तार और बढ़ते शहरीकरण को देखते हुए पटना महानगर क्षेत्र में रैपिड रेल प्रणाली की परिकल्पना भी की जा रही है।

    इसका उद्देश्य पटना को आसपास के प्रमुख शहरों से तेज गति वाले कारिडोर के माध्यम से जोड़ना है। यदि यह परियोजना मूर्त रूप लेती है तो कार्यालय आने-जाने वाले लाखों लोगों की यात्रा का समय काफी कम हो जाएगा।

    प्रस्तावित योजना के अनुसार पटना से आसपास के शहरों के बीच सीधे तेज संपर्क स्थापित करने के लिए रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) तैयार किया जाना है।

    इसका उदेश्य तेज और सुगम तरीके से संबंधित चार स्थानों और राजधानी के बीच सीधा संपर्क स्थापित करना है। इसमें पटना-गयाजी, पटना-बेगूसराय, पटना-हाजीपुर (सोनपुर एयरपोर्ट) और पटना (एयरपोर्ट) से आरा के बीच सीधे रैपिड ट्रांजिट सिस्टम स्थापित की जाएगी ।

    राजधानी से इन शहरों के बीच सीधे विशेष ट्रेन सेवा का परिचालन किया जाएगा। इसका डीपीआर (विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन) तैयार करने के लिए कैबिनेट ने 31.59 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है।

    यह व्यवस्था भविष्य में मेट्रो, रेलवे और बस परिवहन के साथ एकीकृत सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का आधार बन सकती है।

    164 वर्षों की विरासत, भविष्य की नई दिशा

    1862 में जिस स्टेशन की शुरुआत मुख्य रूप से माल ढुलाई के लिए हुई थी, वही स्टेशन आज बिहार की जीवनरेखा बन चुका है।

    कभी यहां से बैलगाड़ियों और नावों के सहारे व्यापार चलता था, आज अत्याधुनिक इलेक्ट्रिक इंजन, सुपरफास्ट ट्रेनें, वंदे भारत, आधुनिक सिग्नल प्रणाली और डिजिटल सेवाएं इसकी पहचान हैं।

    पटना जंक्शन ने अंग्रेजों की व्यापारिक नीति भी देखी, स्वतंत्र भारत का निर्माण भी देखा और अब स्मार्ट सिटी, मेट्रो, रैपिड रेल तथा हाई स्पीड रेल की ओर बढ़ते बिहार का भी साक्षी बन रहा है।

    रेल की यह यात्रा केवल पटरियों की कहानी नहीं है। यह उस शहर की कहानी है जिसने गंगा किनारे बसे एक व्यापारिक नगर से आधुनिक महानगर बनने तक का सफर तय किया।

    और इस पूरे सफर में यदि कोई सबसे स्थायी साथी रहा है, तो वह है पटना का रले नेटवर्क, जो अतीत की विरासत और भविष्य की संभावनाओं के बीच आज भी पूरी रफ्तार से खड़ा है।