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    रंगभरी एकादशी के साथ शुरू हो गई होली, पर बीच में सूतक, आखिर क्या करें?

    Updated: Fri, 27 Feb 2026 11:00 AM (IST)

    आज फाल्गुन शुक्ल एकादशी को रंगभरी और आमलकी एकादशी मनाई जा रही है, जिसमें वैष्णव और गृहस्थ दोनों व्रत रखेंगे। यह दिन आर्द्रा नक्षत्र और आयुष्मान योग के ...और पढ़ें

    वैष्णव और गृहस्थ दोनों एक साथ व्रत रखेंगे

    वैष्णव और गृहस्थ दोनों एक साथ व्रत रखेंगे

    HighLights

    1. आज रंगभरी एकादशी चार शुभ योग में, विष्णु-शिव आराधना।

    2. काशी परंपरा से होली की आध्यात्मिक शुरुआत, अबीर-गुलाल अर्पित।

    3. आमलकी एकादशी पर आंवला वृक्ष पूजा, अक्षय पुण्य प्राप्ति।

    जागरण संवाददाता, पटना। फाल्गुन शुक्ल एकादशी आज शुक्रवार को आर्द्रा नक्षत्र और आयुष्मान योग में मनाई जा रही है। इसे रंगभरी और आमलकी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस बार एकादशी का महत्व इसलिए खास है क्योंकि वैष्णव और गृहस्थ दोनों एक साथ व्रत रखेंगे।
    साधु-संतों के साथ आमजन भी व्रत, पूजन और दान-पुण्य में भाग लेंगे। ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा के अनुसार आज सर्वार्थ सिद्धि, रवियोग, आयुष्मान और सौभाग्य योग का संयोग है।

    विष्णु संग शिव आराधना का विशेष संयोग

    सामान्यतः एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा होती है। लेकिन रंगभरी एकादशी पर भगवान शिव की भी विशेष आराधना की जाती है। घर-घर में शालिग्राम की पूजा, विष्णु सहस्त्रनाम और पुरुष सूक्त का पाठ होगा। साथ ही महादेव को बेलपत्र, भांग और अबीर-गुलाल अर्पित किए जाएंगे।
    घी के दीपक और कर्पूर से आरती करने का भी विधान है। स्नान-दान और धर्मकर्म से अक्षय पुण्य की प्राप्ति मानी गई है।

    काशी से जुड़ी पौराणिक परंपरा

    मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल एकादशी को भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी आए थे। उनके स्वागत में शिवगणों और ऋषि-मुनियों ने अबीर-गुलाल उड़ाया था। इसी परंपरा के तहत काशी में काशी विश्वनाथ मंदिर में आज भगवान को गुलाल अर्पित कर होली की शुरुआत होती है।

    यह दिन आध्यात्मिक उल्लास और रंगों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस परंपरा के कारण इसे रंगभरी एकादशी कहा जाता है। शिव और विष्णु भक्ति का अद्भुत संगम इस दिन देखने को मिलता है।

    आमलकी एकादशी और आंवला का महत्व

    फाल्गुन शुक्ल एकादशी को आमलकी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन आंवला वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में सबसे पहले आंवला वृक्ष की उत्पत्ति हुई थी।

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    आंवला भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इसके मूल में विष्णु, तने में रूद्र और शाखाओं में देवताओं का वास बताया गया है। आंवला पूजन से अक्षय नवमी के समान फल प्राप्त होता है।

    सूतक काल में यह कार्य ना करें

    आपको बता दें कि होली से ठीक पहले चंद्र ग्रहण लग रहा है इसलिए सूतक भी लगेगा। इस काल में भोजन बनाना, खाना, पूजा-पाठ, हवन, यज्ञ, नए कार्य की शुरुआत करने से बचना चाहिए साथ बाल और नाखून को इस दौरान नहीं कटवाना चाहिए। तेल गलाने से भी बचना चाहिए।

    पूजन के प्रमुख शुभ मुहूर्त

    • चर-लाभ मुहूर्त: प्रातः 06:16 से 09:09 बजे तक।
    • अमृत मुहूर्त: सुबह 09:09 से 10:36 बजे तक।
    • अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:39 से 12:25 बजे तक।
    • शुभ योग मुहूर्त: दोपहर 12:02 से 01:29 बजे तक।
    • प्रदोष मुहूर्त: शाम 05:49 से रात्रि 08:26 बजे तक।
    • इन शुभ संयोगों में व्रत, पूजन और आराधना अत्यंत फलदायी मानी गई है।