बांकीपुर उपचुनाव में क्यों हारी भाजपा? समीक्षा में सामने आए कई कारण; प्रशांत किशोर ने ऐसे साधा निशाना
बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार के कई कारण सामने आए हैं, जिसमें अति आत्मविश्वास, स्थानीय मुद्दों की अनदेखी और आंतरिक कलह प्रमुख हैं। प्रशांत किशोर क ...और पढ़ें

अति आत्मविश्वास में बांकीपुर हारी भाजपा।
HighLights
भाजपा की हार का मुख्य कारण अति आत्मविश्वास रहा।
प्रशांत किशोर ने बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे उठाए और सफल रहे।
पार्टी की आंतरिक कलह ने भाजपा को बहुत नुकसान पहुँचाया।
अरुण अशेष, उप राजनीतिक संपादक, बिहार। बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव की बहुस्तरीय और बहुकोणीय समीक्षा हो रही है। सबसे अधिक नुकसान उठा चुकी भाजपा की समीक्षा का प्रारंभिक निष्कर्ष यह है कि अति आत्मविश्वास से उसकी नैया डूबी।
वह मान रही है कि कहानी गढ़ने की उसकी क्षमता कमजोर हुई। इस मोर्चे पर जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर (पीके) बहुत भारी पड़ गए। प्रशांत किशोर ने सधी रणनीति के तहत भाजपा के समर्थकों और धुर विरोधियों को अपनी ओर आकर्षित किया।
सांसद के वीडियो ने पहुंचाया नुकसान
जन सुराज ने भाजपा के एक सांसद का वीडियो प्रसारित किया। इसमें सांसद कह रहे हैं कि भाजपा किसी पालतू को भी उम्मीदवार बना देगी तो वह जीत जाएगा। भाजपा ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।
मात्र इस प्रचार ने भाजपा को बहुत नुकसान पहुंचाया। मतदाताओं ने इसे अहंकार की पराकाष्ठा माना। इस तरह वे मतदान से विमुख हुए या विरोध में खड़े हो गए।
हालांकि अब तक की परिपाटी यही रही है कि भाजपा के समर्थक उम्मीदवार का चेहरा नहीं पार्टी का चुनाव चिन्ह देखते थे। बांकीपुर में यह परिपाटी टूट गई।
भाजपा आने वाले दिनों के लिए तैयारी कर रही है कि किस तरह प्रशांत किशोर का मुकाबला किया जाए। लेकिन, समीक्षा में भाजपा संकोचवश कुछ जरूरी तथ्यों को नकार भी रही है।
उपचुनाव में नहीं चले राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय मुद्दे
पिछले कई चुनावों से भाजपा राष्ट्रीय मुद्दे और नारे पर ही चुनाव जीतती रही है। राज्य के स्तर पर उसने दो मुद्दों का चयन किया। एक- लालू प्रसाद का जंगलराज और दूसरा- एनडीए सरकार का विकास।
उपचुनाव में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय मुद्दे नहीं चले। प्रशांत किशोर ने बुनियादी सुविधाओं का मुद्दा उठाया। उन्हें सफलता मिली। भाजपा धीरे-धीरे स्थानीय कार्यकर्ताओं से भी अलग होती जा रही है।
चुनावी या दूसरी सभाओं में स्थानीय कार्यकर्ता प्रबंधन में लगे रहते हैं। वोट की अपील के लिए भाषण देने की जवाबदेही बाहरी नेताओं की होती है।
बांकीपुर में भी यही हुआ। बाहरी नेताओं की इतनी सभाएं हुईं कि स्थानीय कार्यकर्ताओं को हरेक दरवाजे जाकर वोट के लिए मनुहार करने का समय ही नहीं मिला।
वे बाहरी और बड़े कहे जाने वाले नेताओं का जयकारा लगाने में ही डटे रहे। इससे पहले के चुनावों में भाजपा कार्यकर्ता समर्थक मतदाताओं के घर मतदाता सूची की पर्ची लेकर पहुंचते थे। उनसे आग्रह करते थे कि जलपान से पहले मतदान करें। बांकीपुर में इस बार यह न के बराबर हुआ।
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हर घर तक पहुंचे जन सुराज कार्यकर्ता
दूसरी तरफ जन सुराज के कार्यकर्ता हर घर गए। इशारे में यह भी बताया कि प्रशांत किशोर भाजपा के दुश्मन नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनका पुराना संबंध है।
नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की। इन कार्यकर्ताओं ने जदयू समर्थकों को भी समझाया कि प्रशांत किशोर ने ही 2015 के विधानसभा चुनाव के समय नीतीश कुमार के लिए नारा दिया था- बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है।
यह भी कि कभी पीके जदयू में नीतीश कुमार के बाद दूसरे नंबर के पदधारक थे। उपाध्यक्ष थे। इस तरह के प्रचार के कारण भाजपा और जदयू के कार्यकर्ताओं के मन में पीके के प्रति कभी कटुता का भाव नहीं आया।
भाजपा अपनी समीक्षा में एक और महत्वपूर्ण पक्ष की अनदेखी कर रही है। वह है अंदरूनी कलह। इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भले ही बड़े पदों पर पहुंच गए हों, पार्टी के कई नेता उन्हें पसंद नहीं करते हैं।
प्रशांत किशोर ने भाजपा नेताओं के इस मनोभाव को पहचा। उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की आलोचना की। लेकिन, एनडीए सरकार की तीखी आलोचना से हमेशा परहेज किया।
सम्राट की तुलना में वे आज भी नितिन नवीन के प्रति कम आक्रामक हैं। पीके कहते हैं कि नितिन नवीन का भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना बिहार के लिए गौरव की बात है।
सांगठनिक कमियों की राजद ने की पहचान
समीक्षा में भाजपा इस पक्ष की भी अनदेखी कर रही है कि पीके ने अंदरूनी कलह का कितना लाभ उठाया। क्योंकि भाजपा के कई नेता निजी बातचीत में कह रहे थे कि यह चुनाव नितिन नवीन और सम्राट चौधरी के भविष्य का निर्धारण करेगा। उन्हें भरोसा था कि बांकीपुर में भाजपा की हार हो जाए तो दोनों का पत्ता साफ हो जाएगा।
हार की समीक्षा राजद भी कर रहा है। पहले चरण में उसने सांगठनिक कमियों की पहचान की है। इस आधार पर राजद ने प्रखंड से लेकर जिला स्तर तक की सांगठनिक समितियों को भंग कर दिया है।
उधर पीके की जीत के बहाने एक समीक्षा सवर्ण समाज भी कर रहा है। उसे लग रहा है कि आने वाले वर्षों में पीके इस मिथ को भी तोड़ेंगे कि बिहार में कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है।
क्योंकि पीके को पक्ष और विपक्ष दोनों विचार के मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है। इस समीक्षा में भी एक चूक है। 1994 में वैशाली लोकसभा उपचुनाव के परिणाम और उसके बाद की राजनीतिक स्थिति की अनदेखी हो रही है।
उस उपचुनाव में पक्ष और विपक्ष को दरकिनार कर बिहार पीपुल्स पार्टी की लवली आनंद जीत गई थीं। साल भर बाद हुए विधानसभा चुनाव में इस पार्टी के संस्थापक आनंद मोहन को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया गया था। उस समय की 324 सदस्यीय विधानसभा में बिहार पीपुल्स पार्टी के एक उम्मीदवार विधायक बने थे। आनंद मोहन स्वयं तीन क्षेत्रों में हारे थे।