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जब मुगल बादशाह भी दीवाने हो गए! पढ़िए बिहार के मनेर लड्डू और 52 परतों वाले खाजे की कहानी

Published: Thu, 10 Sep 2026 08:38 PM (IST)

Bihar Famous Sweets: बिहार की मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति और परंपरा का अभिन्न अंग हैं। आइए ...और पढ़ें

बिहार की फेमस मिठाइयां। (जागरण)

बिहार की फेमस मिठाइयां। (जागरण)

HighLights

  1. गयाजी का अनरसा धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा।

  2. सिलाव का खाजा 52 परतों वाला, जीआई टैग प्राप्त, विश्व प्रसिद्ध।

  3. मनेर का लड्डू शाही जुड़ाव, शुद्धता और विशेष निर्माण शैली।

डिजिटल डेस्क, पटना। Bihar Famous Sweets: बिहार की खान-पान संस्कृति में मिठाइयों का स्थान केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहां के सामाजिक ताने-बाने, पर्व-त्योहारों और आत्मीयता से गहराई से जुड़ा हुआ है।

आधुनिक समय में भले ही बाजार में भांति-भांति की महंगी मिठाइयां उपलब्ध हैं, लेकिन एक दौर था जब मिठाई का मतलब घर में खुशी का आगमन और अपनों के लिए सौगात हुआ करता था।

बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में जन्मे पारंपरिक पकवान समय के साथ दुकानों तक पहुंचे और आज अपनी भौगोलिक पहचान (GI Tag) व इतिहास के बल पर देश-विदेश तक मिठास घोल रहे हैं।

आइए जानते हैं बिहार की उन प्रमुख मिठाइयों के बारे में, जिन्होंने अपनी प्रामाणिकता और अनूठे जायके के दम पर सरहदों के पार भी अपनी विशेष पहचान बनाई है।

1. गयाजी का अनरसा (Gaya Anarsa)

अनरसा केवल एक मिष्ठान नहीं, बल्कि गयाजी की धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा व्यंजन है। इसका ऐतिहासिक संबंध गयाजी के गयापाल पुरोहित समाज से माना जाता है।

परंपरा व सौगात: पुराने दौर से लेकर आज तक विवाह और मांगलिक अवसरों पर सौगात के रूप में अनरसा और बताशे भेजने का रिवाज है।

तीर्थ पुरोहित समाज में पूजा-अनुष्ठानों व शुभ अवसरों पर अनरसा की 5, 21 या 51 टोकरियां रखने की शुभ परंपरा है। वहीं, जहानाबाद जिले में तीज और करमा जैसे लोकपर्वों में इसे विशेष प्रसाद के रूप में अर्पण किया जाता है।

आवश्यक सामग्री: पुराना अरवा चावल (पिट्ठी बनाने हेतु), पारंपरिक गुड़ या चीनी, पोस्ता दाना (खसखस), स्टफिंग के लिए भुना हुआ खोया और तलने के लिए शुद्ध घी अथवा तेल।

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बनाने की कला व तकनीक

  • तैयारी: पुराने अरवा चावल को 2-3 दिनों तक पानी में भिगोने के बाद सुखाकर बारीक पीसा जाता है। फिर चावल के इस आटे को गुड़ या चीनी के साथ गूंथ लिया जाता है।
  • आकार व पोस्ता दाना: गूंथे हुए आटे की छोटी-छोटी टिकिया बनाकर उस पर पोस्ता दाना चिपकाया जाता है। यदि खोया अनरसा बनाना हो, तो भीतर भुना खोया भरा जाता है।
  • विशेष सिकाई शैली: अनरसे को पकाने की तकनीक सबसे अनूठी है। इसे कड़ाही में तेज आंच पर डालकर आंच मध्यम कर दी जाती है। अनरसे को पलटा नहीं जाता, बल्कि एक ही तरफ से पकाया जाता है। तलते समय कड़ाही से गर्म तेल बार-बार अनरसे के ऊपरी हिस्से पर डाला जाता है, जिससे यह फूलकर बाहर से कुरकुरा और भीतर से जालीदार बनता है।

2. सिलाव का खाजा ( Silao Khaja)

नालंदा जिले के सिलाव क्षेत्र का 'खाजा' अपने कुरकुरेपन और अदभुत स्वाद के लिए दुनिया भर में मशहूर है। राजगीर और नालंदा आने वाले पर्यटक सिलाव का खाजा चखे बिना अपनी यात्रा अधूरी मानते हैं। इस व्यंजन की गुणवत्ता और भौगोलिक विशिष्टता के कारण इसे जीआई टैग (GI Tag) भी मिल चुका है।

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  • ऐतिहासिक सफर: इस 52 परतों वाले खाजे का इतिहास करीब दो सदी पुराना है। इसकी शुरुआत सिलाव के स्थानीय निवासी काली साह ने की थी। शुरुआत में इसे 'खजूरी' कहा जाता था, जो कालक्रम में 'खाजा' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज उनकी चौथी पीढ़ी इस परंपरा को सहेजे हुए है। परिवार के लगभग 30 सदस्य इस व्यवसाय से जुड़े हैं।
  • वैश्विक पहचान: तकनीक के आधुनिक दौर में सिलाव का खाजा ई-कॉमर्स माध्यमों से अमेरिका, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, स्पेन और सिंगापुर जैसे देशों तक भेजा जा रहा है। हाल ही में जनवरी 2026 में भूटान के गृह मंत्री ल्योनपो शेरिंग ने भी सिलाव पहुंचकर इस ऐतिहासिक व्यंजन के स्वाद की सराहना की थी।

तैयार करने की प्रक्रिया

  • सामग्री: मैदा, शुद्ध घी, चीनी, पानी और इलायची।
  • परत (Layering) तकनीक: मैदे को गूंथकर उसकी पतली शीट बनाई जाती है। इस पर घी और मैदे का विशेष मिश्रण (सासन) लगाकर रोल किया जाता है। बेलने के बाद इसमें लगभग 52 महीन परतें उभरकर आती हैं।
  • तलना व चाशनी: मध्यम आंच पर तेल या घी में इसे हल्का सुनहरा होने तक तला जाता है। तत्पश्चात, इसे चीनी की एक-तार वाली चाशनी में डुबोकर निकाला जाता है।

3. मनेर का लड्डू

राजधानी पटना से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित मनेरशरीफ का लड्डू अपनी खास सुगंध और बनावट के लिए जाना जाता है।

शाही जुड़ाव: कहा जाता है कि मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय जब मनेर आए थे, तो वे यहां से पत्तों के दोने में यह लड्डू दिल्ली ले गए थे। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के नामी कारीगरों को मनेर भेजकर स्थानीय लोगों को इसके निर्माण की सूक्ष्म बारीकियां सिखाईं। ब्रिटिश काल में भी यह मिष्ठान अंग्रेजों के बीच काफी लोकप्रिय रहा।

विरासत व शुद्धता: मनेर में लड्डू निर्माण की शुरुआत बुलाकी साह और फकीरा साह ने की थी, जिसे बाद में सुखदेव साह और अब उनकी तीसरी पीढ़ी आगे बढ़ा रही है। मनेरशरीफ दरगाह आने वाले श्रद्धालु आज भी इस प्रसिद्ध लड्डू को मिट्टी की पारंपारिक हांडी में पैक करवाकर सौगात के रूप में ले जाते हैं।

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विशेष निर्माण शैली

  • शुद्ध बेसन व महीन बूंदी: चने की दाल को पिसवाकर शुद्ध बेसन तैयार किया जाता है। अत्यंत महीन छिद्र वाले झनोटे (छलनी) का उपयोग करके 'डबल जीरो' आकार की बूंदी घी या तेल में तली जाती है।
  • चाशनी व मेवे: चीनी की चाशनी को दूध से साफ करके उसमें तली हुई महीन बूंदी को पकाया जाता है।
  • सुगंध: मिश्रण में कन्नौज से मंगाया गया विशेष केवड़ा जल, मगज (खीरे के बीज), किशमिश और काजू मिलाकर हाथों से गोल लड्डू बांधे जाते हैं।

अनरसा, सिलाव का खाजा और मनेर का लड्डू केवल भोजन की वस्तुएं नहीं हैं; ये बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोककला और आत्मीयता के प्रतीक हैं। बदला हुआ दौर भले ही नई मिठाइयां ले आया हो, लेकिन इन खांटी बिहारी पकवानों की शुद्धता और इनसे जुड़ा आत्मीय भाव आज भी हर दिल को लुभाता है।

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