Swad Bihar Ka: जब कमी ने गढ़ा स्वाद, मिथिलांचल और कोसी की रसोई का लाजवाब कमाल
मिथिलांचल और कोसी की रसोई में 'बिड़िया' और 'अरीकंचन' जैसे व्यंजन अभाव से जन्मे स्वाद की कहानी कहते हैं। बिड़िया दालों और साग को सालभर सुरक्षित रखने की ...और पढ़ें
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अरिकंचन और बीड़ियां की सब्जी। (जागरण)
HighLights
बिड़िया दालों/साग को सालभर सहेजने की पारंपरिक कला।
अरीकंचन अरुई पत्तों से बना, खटास से संतुलित स्वाद।
ये व्यंजन अभाव से जन्मे, अब मिथिलांचल की पहचान।
जागरण टीम, पटना। मिथिलांचल और कोसी की धरती पर स्वाद की एक अनोखी दुनिया बसती है, जहां परंपरा और जुगाड़ मिलकर लाजवाब व्यंजन रचते हैं। ‘बिड़िया’ इसी हुनर की मिसाल है।
दालों और सब्जियों को सहेजकर सालभर के लिए स्वाद और पोषण सुरक्षित रखने की कला। जब ताजी सब्जियां न हों, तब बिड़िया की रसेदार सब्जी घर में खुशबू और संतोष भर देती है।
वहीं ‘अरीकंचन’ साधारण अरुई के पत्तों को मसालों के साथ ऐसा रूप देता है कि हर निवाला खास बन जाए। यह व्यंजन सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि पीढ़ियों की समझ, संघर्ष और सृजनशीलता की कहानी भी कहते हैं।
पोखर किनारे उगा स्वाद, थाली में बसा अरीकंचन
मिथिलांचल की रसोई में अगर स्वाद की कोई असली कसौटी है, तो वह है अरीकंचन। ऐसा व्यंजन, जो अच्छे-अच्छे मांसाहारी पकवानों को भी फीका कर दे।
बारिश की पहली फुहार के साथ ही जब गांव के तालाब और पोखर किनारे हरियाली झूमती है, तो अरीकंचन के कोमल पत्ते चुपके से धरती का आंचल थाम लेते हैं।
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अरिकंचन की सब्जी। जागरण
रहिका प्रखंड के नाजिरपुर गांव की 80 वर्षीया पवन देवी बताती हैं, इसे बनाना हर किसी के बस की बात नहीं, इसमें धैर्य भी चाहिए और समझ भी। इन पत्तों में कुदरती तीखापन होता है, जिसे नींबू या अमचूर की खटास ही संतुलित कर पाती है।
यही खटास, अरीकंचन के स्वाद को खास बनाती है। एक ऐसा स्वाद, जो जुबान पर चढ़कर दिल में बस जाता है। बरसात के दिनों में इसकी बहार रहती है। खास बात यह कि एक बार पत्ते तोड़ लेने के बाद भी पौधा फिर से लहलहा उठता है, जैसे स्वाद की यह परंपरा कभी खत्म ही नहीं होती।
ग्रामीण महिलाएं, इसे लोढ़ा भी कहती है। गोल लपेट कर सुखा लेती हैं, ताकि आने वाले छह महीनों तक भी इस देसी स्वाद का आनंद लिया जा सके।
अरीकंचन सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि मिथिला की मिट्टी, मौसम और मांओं की रसोई का जीवंत स्वाद है। जो अब गांव की चौखट लांघकर महानगरों तक अपनी खुशबू बिखेर रहा है।
जब रसोई में नहीं था कुछ तब बिड़िया बनी सहारा
मिथिलांचल की रसोई में बिड़िया सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि संघर्ष के दिनों की सहेजी हुई समझदारी है। मधुबनी समेत पूरे इलाके में यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऐसे ही जीवित रही है, जैसे किसी विरासत को मां से बेटी तक सहेजकर सौंपा जाता है।
इसकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि एक बार मेहनत से बना ली जाए, तो साल भर थाली का स्वाद बनाए रखती है। पुराने दिनों में जब न कोल्ड स्टोरेज थे, न सब्जियों की भरमार, तब गर्मी और बारिश के मौसम में हरी सब्जियां लगभग गायब हो जाती थीं।
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बीड़ियां की सब्जी। जागरण
ऐसे में बिड़िया ही रसोई का सहारा बनती थी। मधुबनी की हेमा कर्ण याद करती हैं, लगातार बारिश में जब बाहर निकलना मुश्किल होता था। तब यही बिड़िया थाली की शान बढ़ाती थी।
बिड़िया बनाने की प्रक्रिया भी अपने आप में कला है। रहिका के सौराठ की अनुपमा मिश्रा बताती हैं कि यह हुनर उन्होंने अपनी दादी और सास से सीखा।
ताजे चने, बथुआ या केराव के साग को बेसन या चावल के आटे के पेस्ट में लपेटकर छोटी-छोटी टिकियां बनाई जाती हैं और फिर कड़ी धूप में सुखाया जाता है। आज वही बिड़िया, जो कभी अभाव में सहारा थी, अब शौक और पहचान बन गई है। यहां तक कि सात समंदर पार बसे मिथिलावासियों के लिए भी सबसे प्यारी सौगात बन गई है।
बिड़िया बनाने की विधि सामग्री
ताजे चने का साग, बथुआ, केराव, बेसन या चावल का आटा, तेल, जीरा, लाल मिर्च, प्याज, लहसुन-अदरक का पेस्ट, हल्दी, धनिया पाउडर, सरसों, लाल मिर्च पाउडर, खटाई।
बनाने की विधि
साग को आटे के साथ मिलाकर छोटे टुकड़े बनाकर धूप में सुखाएं। पकाने से पहले इन्हें पानी में भिगोकर हल्का तल लें। कड़ाही में तेल गर्म कर जीरा, मिर्च, प्याज व लहसुन-अदरक भूनें। मसाले डाल भूनने के बाद बिड़िया और थोड़ा पानी डालें। धीमी आंच पर पकाकर अंत में खटाई डालें।
अरीकंचन बनाने की विधि सामग्री
अरीकंचन के पत्ते, बेसन, हल्दी, लाल मिर्च, नमक, नींबू रस/आमचूर, तेल, सरसों, लहसुन, हरी मिर्च। बनाने की विधि: पत्तों को धोकर हल्का नरम करें।
बेसन में मसाले मिलाकर पेस्ट बनाएं और पत्तों पर लगाकर 8–10 परत का रोल बनाकर सुखाएं। इसे टुकड़ों में काटकर तल लें। कड़ाही में तेल गर्म कर सरसों, लहसुन, हरी मिर्च भूनें, मसाले व थोड़ा पानी डालें। तले टुकड़े डालकर धीमी आंच पर पकाएं।