Swad Bihar Ka: खा-जा से खाजा तक, सिलाव की खनक और पिपरा की नरमी का जवाब नहीं
सिलाव और पिपरा का खाजा बिहार की ऐतिहासिक और पारंपरिक मिठाई है। सिलाव का 52 परतों वाला कुरकुरा खाजा और पिपरा का मुलायम, रसदार खाजा अपनी अनूठी मिठास के ...और पढ़ें

बिहार का खाजा। (जागरण)
HighLights
सिलाव का खाजा 52 परतों वाला कुरकुरा और ऐतिहासिक।
पिपरा का खाजा अपनी मुलायम, रसदार मिठास के लिए प्रसिद्ध।
खाजा का नाता बुद्ध काल से, जीआई टैग प्राप्त।
जागरण टीम, पटना। सिलाव और पिपरा का खाजा सच में जवाब नहीं वाली मिठास है। यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि इतिहास और परंपरा का स्वाद है। कहा जाता है कि इसका नाता भगवान बुद्ध और नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़ा है, जहां आचार्य शीलभद्र ने पहली बार ‘खा-जा’ कहकर इस अनोखी परतदार मिठाई का नाम दिया। यह लोक मान्यता है।
आज भी तिलक, छेका या बेटी की विदाई में खाजा भेजना सम्मान व स्नेह का प्रतीक है। सिलाव का 52 परतों वाला कुरकुरा खाजा और पिपरा का मुलायम, रसदार खाजा दोनों का स्वाद अलग ही जादू रचता है।
जैसे ही टुकड़ा मुंह में जाता है, परतें घुलकर मिठास का ऐसा एहसास देती हैं, जो सीधे दिल तक जाता है। यही वजह है कि बिहार की पहचान में खाजा की मिठास हमेशा रहती है।
खजूरी से खाजा तक, 52 परतों में बसी सदियों की मिठास
सिलाव की गलियों में बसती काली साह की विरासत आज भी खाजा की हर परत में सांस लेती है। करीब 200 साल पहले काली साह ने 52 परतों वाले इस अनोखे खाजे की व्यावसाियक रूप में शुरुआत की, जिसे तब ‘खजूरी’ कहा जाता था।
वक्त बदला, नाम बदला, लेकिन स्वाद वही रहा लाजवाब और यादगार। उस दौर में घर पर गेहूं पीसकर मैदा तैयार होता और घी में खाजा बनता था, एक सेर खाजा महज एक पैसे में बिकता था।
आज पांचवीं पीढ़ी इस परंपरा को नई ऊंचाइयों तक ले जा रही है। दारोगा की नौकरी छोड़ पुश्तैनी हुनर अपनाने वाले वंशजों ने तकनीक के सहारे इस मिठास को अमेरिका, लंदन, दुबई व कतर तक पहुंचा दिया।
सिलाव का खाजा को जीआई टैग मिलना इसकी पहचान का बड़ा प्रमाण है। 1986 के दिल्ली अपना महोत्सव से शुरू हुआ इसका वैश्विक सफर मारीशस और सिंगापुर तक जा पहुंचा, जहां इसे सर्वश्रेष्ठ मिठाई का खिताब भी मिला।
एपीजे अब्दुल कलाम से लेकर हेमा मालिनी तक इसके दीवाने रहे हैं। अब चाकलेट, वनीला और मैंगो फ्लेवर भी उपलब्ध है।

सुपौल-पिपरा का खाजा। जागरण
चवन्नी भी धंस जाए वाली मिठास पिपरा के खाजा की, कहानी सौ साल पुरानी
चवन्नी भी धंस जाती थी… । यह कोई कहावत नहीं, बल्कि सुपौल के पिपरा के खाजे की असली पहचान है। जिला मुख्यालय से करीब 21 किलोमीटर दूर एनएच 106 और 327ई के किनारे बसा पिपरा, जैसे ही आप यहां कदम रखते हैं, घी और मैदे की खुशबू आपका स्वागत करती है।
यह महज मिठाई नहीं, बल्कि एक सदी पुरानी विरासत है, जिसकी शुरुआत 1920 में गौनी साह ने की थी। जागुर से आए इस कारीगर ने जो स्वाद गढ़ा, उसे आज उनकी पांचवीं पीढ़ी पूरे गर्व से संभाले हुए है। पुराने लोग बताते हैं कि पहले यहां गोल खाजा बनता था।
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इतना मुलायम कि उस पर अगर चवन्नी गिरा दी जाए, तो वह भी अंदर धंस जाए। समय बदला, तो खाजा भी बदला। अब यह लंबा और हल्का कुरकुरा हो गया है, लेकिन स्वाद की आत्मा आज भी वैसी ही है।
जिउतिया और छठ जैसे पर्व आते ही पिपरा की गलियां कड़ाहों की छन-छन से गूंज उठती हैं। दिन-रात बनते खाजे की खुशबू दूर तक फैलती है, और हर दिन 10 क्विंटल से ज्यादा खाजा लोगों की थालियों तक पहुंच जाता है,मिठास के साथ परंपरा भी परोसते हुए।
सामग्री: मैदा, घी (मोयन और तलने के लिए), रिफाइंड (वैकल्पिक, तलने के लिए), चीनी, पानी
बनाने की विधि: मैदे को अच्छी तरह गूंथा जाता है। इसमें घी का मोयन मिलाकर उसे मुलायम बनाया जाता है। इसके बाद खास ‘लेयर’ (स्थानीय भाषा में हलवा) लगाई जाती है, ताकि परतें आपस में चिपके नहीं।
अब आता है सबसे अहम चरण परत बनाना। मैदे की लोई को बहुत पतला बेलकर उस पर बार-बार घी लगाया जाता है और रोल किया जाता है। इस प्रक्रिया को कई बार दोहराने से करीब 52 परतें तैयार होती हैं, जो खाजे को उसकी खास कुरकुराहट देती हैं।
इसके बाद इस लंबी परतदार लोई को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और धीमी आंच पर घी या रिफाइंड में तला जाता है। तलते ही परतें फूलकर अलग-अलग खिल जाती हैं। तले हुए खाजे को गर्म चाशनी में डुबोया जाता है। चाशनी हर परत में समाकर इसे बाहर से कुरकुरा और रसीला बना देती है।