खेतों में समा गईं सहायक नहरें, पूर्णिया जिले के धमदाहा अनुमंडल में "नहर चोरी" का बड़ा खेल
पूर्णिया के धमदाहा अनुमंडल में "नहर चोरी" का चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां सहायक नहरों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण कर उन्हें खेतों में बदला जा ...और पढ़ें

खेतों में समा गईं सहायक नहरें, पूर्णिया जिले के धमदाहा अनुमंडल में "नहर चोरी" का बड़ा खेल

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
सुशांत कुमार, धमदाहा (पूर्णिया)। अनुमंडल में पुल चोरी, टॉवर चोरी और सरकारी भवनों से सामान गायब होने की चर्चाओं के बीच अब “नहर चोरी” का मामला भी सामने आने लगा है। यह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन जमीनी हकीकत इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली है।
अनुमंडल के धमदाहा, भवानीपुर, रुपौली और आसपास के कई इलाकों में सिंचाई विभाग की मुख्य नहरों और खेतों तक पानी पहुंचाने वाली सहायक नहरों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण किया जा रहा है।
हालत यह है कि कई जगहों पर सहायक नहरें पूरी तरह खेतों में तब्दील हो चुकी हैं और उनका अस्तित्व तक मिट गया है।
स्थानीय किसानों के अनुसार, मुख्य नहरों से गांव और खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए वर्षों पहले छोटी-छोटी सहायक नहरों का निर्माण कराया गया था। इन नहरों के माध्यम से हजारों एकड़ खेतों की सिंचाई होती थी, लेकिन बीते कई वर्षों से इन नहरों की देखरेख नहीं होने के कारण अतिक्रमणकारी धीरे-धीरे इन पर कब्जा जमाते गए।
पहले किनारों को काटा गया, फिर मिट्टी भरकर समतल किया गया और अब कई जगहों पर ट्रैक्टर से जुताई कर पूरी नहर को खेत बना दिया गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि कुछ स्थानों पर तो नहर की जमीन पर स्थायी निर्माण तक कर लिया गया है। कहीं घर बना दिए गए हैं तो कहीं बांस-बल्ला और घेराबंदी कर निजी जमीन की तरह उपयोग किया जा रहा है। सबसे गंभीर स्थिति सहायक नहरों की है, क्योंकि इनकी नियमित मॉनिटरिंग नहीं होने के कारण अतिक्रमणकारियों ने इन्हें सबसे आसान निशाना बना लिया है।
किसानों ने आरोप लगाया कि सिंचाई विभाग केवल कागजों पर ही नहरों की सफाई और निगरानी का दावा करता है। जमीनी स्तर पर न तो समय पर सर्वे कराया जाता है और न ही अतिक्रमण हटाने की प्रभावी कार्रवाई होती है।
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परिणाम यह है कि कई गांवों में अब खेतों तक पानी पहुंचना बंद हो गया है। जिन किसानों की खेती नहर आधारित सिंचाई पर निर्भर थी, उन्हें अब डीजल पंप और निजी बोरिंग का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन और सिंचाई विभाग ने जल्द सख्त कदम नहीं उठाए तो आने वाले कुछ वर्षों में अधिकांश सहायक नहरों का अस्तित्व हीं इसी तरह से समाप्त हो जाएगा।