गुप्ता धाम की रहस्यमयी गुफा, जहां भस्मासुर से डरकर छिप गए थे महादेव; यहीं मौजूद है 'पातालगंगा'
रोहतास जिले के चेनारी प्रखंड में स्थित गुप्ता धाम कैमूर पहाड़ी पर एक प्रसिद्ध शैव केंद्र है, जहां पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव भस्मासुर से भयभीत ...और पढ़ें

गुप्ता धाम गुफा में स्थित प्राकृतिक शिवलिंग।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
सतीश कुमार, सासाराम (रोहतास)। रोहतास जिले के चेनारी प्रखंड में स्थित गुप्ता धाम की साहसिक व सुखद यात्रा में पहाड़ का उतार-चढ़ाव, समतल, झरने, नदियां, जंगल सबकुछ मिलता है। कैमूर पहाड़ी पर गुफा में स्थित गुप्ता धाम की ख्याति शैव केन्द्र के रूप में है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भस्मासुर से भयभीत होकर भगवान शिव को भागना पड़ा था। वह इसी धाम की गुफा में आकर छुपे थे। भगवान विष्णु ने पार्वती का रूप धारण करके भस्मासुर को अपने सिर पर हाथ रखकर नृत्य करने का प्रस्ताव दिया था।
देवी पार्वती से शादी करने के लोभ में भस्मासुर ने जब अपने सिर पर हाथ रखकर नृत्य शुरू किया, तो भगवान शिव से प्राप्त किए गए वरदान के कारण वह जलकर भस्म हो गया।
ऐतिहासिक गुप्तेश्वरनाथ महादेव के गुफा मंदिर को लेकर कई किवदंतियां हैं, किन्तु बाबाधाम की तरह गुप्तेश्वरनाथ यानी गुप्ता धाम श्रद्धालुओं में काफी लोकप्रिय है। यहां बक्सर से गंगाजल लेकर शिवलिंग पर चढ़ाने की परंपरा है।
गुफा में गहरा अंधेरा होता है, बिना कृत्रिम प्रकाश के भीतर जाना संभव नहीं है। पहाड़ी पर स्थित इस पवित्र गुफा के द्वार पर जाने के बाद सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है। द्वार के पास 18 फीट चौड़ा एवं 12 फीट ऊंचा मेहराबनुमा है। सीधे पूरब दिशा में चलने पर पूर्ण अंधेरा हो जाता है।
गुफा में लगभग 363 फीट अंदर जाने पर बहुत बड़ा गड्ढा है, जिसमें सालभर पानी रहता है, इसलिए इसे पातालगंगा कहते हैं।

गुफा के अंदर प्राचीन काल के दुर्लभ शैलचित्र आज भी मौजूद हैं। इसी गुफा के बीच से एक अन्य गुफा शाखा के रूप में फूटती है, जो आगे एक कक्ष का रूप धारण करती है। इसी कक्ष को लोग नाच घर या घुड़दौड़ कहते हैं। रोशनी का समुचित प्रबंध नहीं होने के कारण श्रद्धालु नाच घर को नहीं देख पाते हैं।
खबरें और भी
यहां से पश्चिम जाने पर एक अन्य संकरी शाखा दाहिनी ओर जाती है। इसके आगे के भाग को तुलसी चौरा कहा जाता है। इस मिलन स्थल से एक और गुफा थोड़ी दूर दक्षिण होकर पश्चिम चली जाती है। इसी में गुप्तेश्वर महादेव नामक शिवलिंग है। गुफा में अवस्थित शिवलिंग वास्तव में प्राकृतिक शिवलिंग है।
शिवलिंग पर गुफा की छत से बराबर पानी टपकता रहता है। इस पानी को श्रद्धालु प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। वहीं, गुप्ता धाम से लगभग डेढ़ किमी दक्षिण में सीता कुंड है, जिसका जल बराबर ठंडा रहता है। यहां स्नान करने का अद्भुत आनंद है।
इस स्थान पर सावन महीने के अलावा सरस्वती पूजा और महाशिवरात्रि के मौके पर मेला लगता है। सावन में एक महीना तक बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नेपाल से हजारों शिवभक्त यहां आकर जलाभिषेक करते हैं। बक्सर से गंगाजल लेकर गुप्ता धाम पहुंचने वाले भक्तों का तांता लगा रहता है।
लोग बताते हैं कि विख्यात उपन्यासकार देवकी नंदन खत्री ने अपने चर्चित उपन्यास चंद्रकांता में विंध्य पर्वत शृंखला की जिन तिलस्मी गुफाओं का जिक्र किया है, संभवत: उन्हीं गुफाओं में गुप्ता धाम की यह रहस्यमयी गुफा भी है। वहां धर्मशाला और कुछ कमरे अवश्य बने हैं, परंतु अधिकांश जर्जर हो चुके हैं।
रोहतास के इतिहासकार डॉ. श्यामसुंदर तिवारी का कहना है कि गुफा के नाचघर और घुड़दौड़ मैदान के बगल में स्थित पताल गंगा के पास दीवार पर उत्कीर्ण शिलालेख, जिसे श्रद्धालु ‘ब्रह्मा के लेख’ के नाम से जानते हैं। इसको पढ़ने से संभव है इस गुफा के कई रहस्य खुल जाएं।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को चाहिए कि पुरातत्ववेत्ताओं और भाषाविदों की मदद से अबतक अपाठ्य रही इस लिपि को पढ़वाया जाए, ताकि इस गुफा के रहस्य पर पड़ा पर्दा हट सके।
रोहतास जिला मुख्यालय सासाराम से करीब 55 किलोमीटर दूरी पर स्थित गुप्ता धाम गुफा बाबा गुप्तेश्वर धाम में पहुंचने के लिए रेहल, पनारी घाट और उगहनी घाट से तीन रास्ते हैं, जो दुर्गम हैं। अब नया रास्ता ताराचंडी धाम के पास से है। इस रास्ते से पहाड़ी पर वाहन भी जाते हैं।
पनियारी घाट से ऐसे जाएं गुप्ता धाम:
सासाराम से लगभग 40 किलोमीटर दूर आलमपुर के रास्ते पनियारी पहुंचे, जहां से सामने पहाड़ी पर चढ़ाई करनी होती है। सामने से इसकी ऊंचाई का आकलन करना मुश्किल है। इसकी ऊंचाई लगभग 3000 मीटर के आसपास होगी। वैसे प्रमाणित नहीं, ये ऊंचाई अनुमानित है।
यहां एक देवी का स्थान है, जिसको लोग पनियारी माई के नाम से जानते हैं। यहां जमीन के नीचे से बारहों महीने पानी निकलता रहता है। शिवभक्त यहां पनियारी माई का दर्शन कर के आगे की यात्रा करते हैं।
पहाड़ चढ़ाई के रास्ते में अनेक तरह की आवाजें, जीव-जंतु, सुंदर प्राकृतिक छटा मन को मोहित कर देता है। रास्ते में बंदर और लंगूरों का झुंड इस यात्रा को और भी अद्भुत बनाता है।
यह भी पढ़ें- बिहार में ताजमहल जैसा नजारा: वास्तुकला की अनूठी धरोहर है 'शेरशाह का मकबरा', खूबसूरती पर कनिंघम भी था फिदा
यह भी पढ़ें- बिहार में भी है इंद्रधनुष वाला झरना, धुंआ कुंड का नजारा कर देगा मंत्रमुग्ध; कैमूर की वादियों में छिपा स्वर्ग